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अस्तित्व बूंद का बनता है तभी जब विराट सत्ता से पाती है पृथक स्वयं की एक इकाई में कर लेती है स्थिर।
एक बूंद

अस्तित्व बूंद का
बनता है तभी
जब विराट सत्ता से
पाती है पृथक
स्वयं की एक इकाई में
कर लेती है स्थिर।
बूंद स्वाति की
बन जाती है मोती
कपूर बन जाता है
कंदली वन में
वंशलोचन बांस के कुंजों में
प्रकृति जल उठती है
ग्रीष्म की तपन में
तो–
पहली बूंद आसाढ़ की
बन जाती है सौंधी-सी गंध।
ढुलक जाती है एक बूंद
कपोलों पर तब
प्रेम का सागर बन जाती है
इस तरह
आवृत्ति में
‘स’ वर्ण की
शक्ति, शील, सौंदर्य को पा
धन्य समझता है-‘अहंकार मन’
फिर भी नहीं ‘शांति’
क्योंकि सिमट गई है—-
विराट में ‘एक बूंद’ !!
डॉ. पल्लवी सिंह ‘अनुमेहा’
लेखिका एवं कवयित्री
बैतूल, मध्यप्रदेश


