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नन्ही पर महान सोच: भोपाल की हर्षाली श्रीवास्तव बनी कायस्थ समाज के डिजिटल आंदोलन की सबसे कम उम्र की प्रेरक जब कोई बच्चा समाज की चेतना का वाहक बन

नन्ही पर महान सोच: भोपाल की हर्षाली श्रीवास्तव बनी कायस्थ समाज के डिजिटल आंदोलन की सबसे कम उम्र की प्रेरक जब कोई बच्चा समाज की चेतना का वाहक बन जाए, तो वह केवल एक छात्र नहीं, आने वाली पीढ़ियों की प्रेरणा बन जाता है। भोपाल की कक्षा 7 की छात्रा हर्षाली श्रीवास्तव, पाखी ने यह साबित कर दिया है कि संगठन, जागरूकता और पहचान की अलख केवल मंचों से नहीं, दिल से चलती है — और जहाँ दिल बच्चे का हो, वहाँ असर गहरा होता है। अखिल भारतीय कायस्थ महासभा द्वारा चलाया जा रहा ‘के-कार्ड अभियान’ – समाज की डिजिटल एकता का प्रतीक बनता जा रहा है। और इसी अभियान को बाल वर्ग में पहुँचाने का श्रेय आज एक नन्ही बेटी को मिल रहा है, जिसने समाज में बदलाव की शुरूआत अपने स्कूल से की। हर्षाली की के-कार्ड यात्रा अपने घर से शुरू हुयी हर्षाली के पिता वेद आशीष श्रीवास्तव अखिल भारतीय कायस्थ महासभा के राष्ट्रीय युवा अध्यक्ष हैं। वे रोज़ लोगों को ‘के-कार्ड’ की आवश्यकता और उपयोगिता समझाते हैं, कॉल्स पर समाज की एकता के लिए अपील करते हैं। घर का ये वातावरण हर्षाली के कोमल मन में उतरता गया — और एक दिन उसने पापा से सीधा सवाल किया: “पापा, ये के-कार्ड क्या है? क्या मैं भी कुछ कर सकती हूँ? “यह सवाल सिर्फ एक मासूम जिज्ञासा नहीं था, यह समाज में एक नए अभियान का जन्म था। पापा ने जैसे ही अपनी बेटी को समझाया कि “के-कार्ड कायस्थ समाज की

डिजिटल पहचान है”, उसी क्षण हर्षाली ने तय कर लिया कि वह इसे अपने स्कूल के कायस्थ दोस्तों तक पहुँचाएगी। हर्षाली ने सबसे पहले अपना के-कार्ड बनवाया। फिर पापा से उसका QR कोड और रेफरल लिंक प्रिंट करवाया और स्कूल की डायरी के साथ-साथ एक नई ज़िम्मेदारी अपने बैग में रख ली।अब हर ब्रेक में, हर खेल-कूद के समय, वह अपने कायस्थ दोस्तों को समझाती — के-कार्ड बनाओ “ये सिर्फ कार्ड नहीं, हमारी पहचान है। प्लीज़ घर जाकर अपने पेरेंट्स को बताओ और बनवाओ।”धीरे-धीरे हर्षाली की यह मेहनत रंग लाने लगी। अब बच्चों के माता-पिता खुद उसे कॉल करने लगे। हर्षाली मुस्कुरा कर अपने पापा से कहती है, लीजिए आपके लिए एक और कॉल है।”आज उसके स्कूल के कई कायस्थ परिवार ‘के-कार्ड’ अभियान से जुड़ चुके हैं – और सबका सूत्रधार बनी है एक नन्ही बच्ची की सोच।हर्षाली एक चित्रकार भी है। उसे भगवान के स्केच बनाना बेहद पसंद है। वह चित्रगुप्त जी के बनाए चित्र अपनी सहेलियों को गिफ्ट करती है और कहती है – ये हमारे कुल देवता हैं। “हर यम द्वितीया पर वह रंगोली बनाती है, चित्रगुप्त जी की प्रतिमा का श्रृंगार करती है, कायस्थ समाज के कार्यक्रमों में भाग लेती है — और यह सब उसे विरासत में मिला है अपने दादा दादी और पापा से, हर्षाली के साथ भाई यशवर्धन श्रीवास्तव भी समाजसेवा में तकनीकी योगदान दे रहा हैं। वह वेबसाइट डिज़ाइनिंग, सोशल मीडिया मैनेजमेंट और पापा की डिजिटल टीम में सक्रिय है। यह एक ऐसा परिवार हैं जो न केवल संगठन की बातें करता है, बल्कि कायस्थ समाज के लिए जीता है।

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