पद्म पुराण में रुद्राक्ष का महत्व, रुद्राक्ष क्यों पहनना चाहिए – डॉ. बी. के. मल्लिक
रुद्राक्ष के बारे में सभी लोग जानते हैं लेकिन इसका विस्तृत चर्चा पद्मपुराण में किया गया है। रुद्राक्ष के धारण करने से पाप कम होता है और रुद्राक्ष पहनने वाले आदमी शिव भक्त के रूप में जाने जाते हैं। रुद्राक्ष का धरण मस्तक पर हृदय के पास और बांह में किया जाता है और इसके पहनने से वह साक्षात भगवान शिव सबसे प्रिय रुद्राक्ष जो कलयुग में मिलता है वह भगवान शिव का अन्य भक्त होता है।
पद्म पुराण के अनुसार रुद्राक्ष की उत्पत्ति भगवान शिव द्वारा किया गया। जिसका कहानी है कि सतयुग में त्रिपुर नाम का एक दानव रहता था वह लोगों का वध करके अपने अंतरिक्ष जारी नगर में छिप जाता था । ब्रह्मा जी के वरदान से प्रबल होकर वह संपूर्ण लोगों के विनाश की चेष्टा करता था । उसके अत्याचार देखकर देवताओं के निवेदन करने पर भगवान शंकर को सारी बातें सुनाया। इस समाचार सुनते ही उन्होने धनुष से विकराल बंजारा आया और त्रिपुर नामक दानव को दिव्य दृष्टि से देखकर मार डाला। त्रिपुर नामक दानव आकाश से टूट कर गिरने वाली बहुत बड़ी लुक के समान इस पृथ्वी पर गिरा। उसको करने में भगवान शंकर को अत्यंत ही परिश्रम करना पड़ा और इस परेशान के कारण भगवान शिव के शरीर से पसीना एवं आंख से आंसू से बूंद टपकने लगा। उन बूंद से ही तुरंत ही पृथ्वी पर रुद्राक्ष महान वृक्ष प्रकट हुआ। इसका फल अत्यंत गुप्त होने के कारण साधारण जीव उसे नहीं जानते तदनंतर में एक दिन कैलाश शिखर पर विराजमान होते हुए देव विधि देव भगवान शंकर को प्रणाम करके कार्तिकेय जी ने कहा था मैं रुद्राक्ष का यथार्थ फल जानना चाहता हूं। उसे पर जप करने तथा उसका धारण दर्शन अथवा और स्पर्श करने से क्या फल मिलता है।
रुद्राक्ष के दर्शन से, स्पर्श से तथा उसपर जप करने से वह समस्त पापों को दूर करके मनुष्य को मोक्ष प्रदान करता है। रुद्राक्ष के अनेक भेद होते हैं। यह एकमुखी से लेकर चौदह मुखी तक के होते हैं।
रुद्राक्ष के प्रकार और महत्व
एक मुख वाला रुद्राक्ष साक्षात शिव का स्वरूप है। वह भोग और मोक्ष प्रदान करने वाला है। उसके दर्शन मात्र से ही ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्ति मिल जाती है। यह रुद्राक्ष उन्हें पहनना चाहिए जो मोक्ष की कामना रखते हैं।
दोमुखी रुद्राक्ष देवदेवेश्वर कहा गया है। वह संपूर्ण कामनाओं और फलों को देने वाला है। यह रुद्राक्ष अनजाने में हुई गोहत्या के पाप से मुक्ति दिलाता है। यह रुद्राक्ष साधकों को धारण करना चाहिए।
तीन मुखी रुद्राक्ष साधना का साक्षात फल देने वाला कहा गया है। इसे धारण करने से सारी विद्याएं प्राप्त हो जाती है। इसे विद्यार्थियों और नई-नई चीजें सीखने वालों को अवश्य पहनना चाहिए।
चार मुखी रुद्राक्ष साक्षात ब्रह्मा का स्वरूप कहा गया है। इसे धारण करने से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति होती है। यह रोग दूर करने वाला रुद्राक्ष है। रोगी को पहनाने से शीघ्र रोग मुक्त करता है।
पांच मुखी रुद्राक्ष कालाग्निरुद्र रूप होता है। वह सबकुछ करने में समर्थ बनाता है। इसे धारण करने से मनुष्य असंभव कार्य भी संभव कर दिखाता है। इसे पहनने से आत्मविश्वास में वृद्धि होती है।
छह मुख वाला रुद्राक्ष कार्तिकेय का रूप है। इसे दाहिनी बांह में धारण करने से मनुष्य बलवान बनता है। उसमें साहस और शौर्य का संचार होता है। यह रुद्राक्ष अनजाने में किए अनेक पापों को दूर करता है।
सात मुख वाला रुद्राक्ष अनंग नाम से प्रसिद्ध है। इसको धारण करने से दरिद्र भी ऐश्वर्यशाली हो जाता है। इसे लक्ष्मी का प्रतीक कहा गया है। धन की चाह रखने वालों को यह रुद्राक्ष पहनना चाहिए।
आठ मुख वाला रुद्राक्ष अष्टमूर्ति भैरव स्वरूप है। इसको धारण करने से मनुष्य को पूर्णायु प्राप्त होती है।
नौ मुखी रुद्राक्ष भैरव तथा कपिलमुनी का प्रतीक है। इसे धारण करने वाले मनुष्य के सारे कठिन कार्य भी सहज पूरे हो जाते हैं।
दस मुखी रुद्राक्ष विष्णु स्वरूप है। इसे धारण करने से भोग और मोक्ष दोनों की प्राप्ति होती है। यह रुद्राक्ष श्री प्रदाता होता है।
ग्यारह मुखी रुद्राक्ष रुद्ररूप है। इसे पहनने से मनुष्य सर्वत्र विजयी होता है। कोर्ट कचहरी के मुकदमों में जीत दिलाता है।
बारह मुखी रुद्राक्ष को पहनने से चेहरे पर तेज आता है। मनुष्य तेजस्वी बनता है।
तेरह मुखी रुद्राक्ष विश्वेदेवों का स्वरूप है। इसे धारण करने से सौभाग्य तथा मंगल की प्राप्ति होती है।
चौदह मुखी रुद्राक्ष परमशिव का प्रतीक है। इसे धारण करने से समस्त पापों का नाश होता है। कर्म बंधन टूट जाते हैं।
डॉ. बी. के. मल्लिक
वरिष्ठ लेखक
9810075792




