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महाशिवरात्रि का उत्सव क्यों मनाया जाता है क्या है इसका महत्व – डॉ. बी. के. मल्लिक

महाशिवरात्रि का उत्सव क्यों मनाया जाता है क्या है इसका महत्व – डॉ. बी. के. मल्लिक

शिवरात्रि हिंदुओं का एक विशेष पर्व है जिस दिन भगवान शिव का पार्वती से विवाह हुआ था उसे रात्रि को महाशिवरात्रि कहा जाता है।
एक शक्ति है, एक रहस्यमय ऊर्जा जिससे सब जगत चलायमान है। वैज्ञानिक अभी तक इसे कोई नाम नहीं दे पाये हैं। हालांकि, प्राचीन काल के ऋषियों और संतों ने इस अज्ञात शक्ति को शिव कहा है।

शिव वह ऊर्जा है जो हर जीव के भीतर मौजूद है। इस ऊर्जा की वजह से ही हम अपनी दैनिक गतिविधियाँ जैसे सांस लेना, खाना, उठाना, चलना और बैठना कर पाते हैं। यह ऊर्जा न केवल जीवित प्राणियों को चलाती है, बल्कि यह निर्जीव चीज़ों में भी कार्य करती है। इस प्रकार शिव अस्तित्व को संचालित करते हैं। वैसे तो महाशिवरात्रि को लेकर कई कहानियाँ मौजूद हैं। उनमें से कुछ का यहाँ उल्लेख किया जा रहा है । महाशिवरात्रि के दिन भगवान् शिव ने देवी पार्वती से विवाह किया था|
जब देवता और राक्षस अमृत की खोज में समुद्र मंथन कर रहे थे तब मंथन से विष निकला था और स्वयं भगवान शिव ने विष पी कर उसे अपने कंठ में रोक लिया था जिस वजह से उनका शरीर नीला पड़ गया था और उनको “नीलकंठ” भी कहा जाता है। विष पीकर उन्होंने सृष्टि और देवतागण दोनों को बचा लिया तो इसलिए भी शिवरात्रि का उत्सव मनाया जाता है।

एक और किवदंती यह है कि जब देवी गंगा पूरे उफ़ान के साथ पृथ्वी पर उतर रहीं थी तब भगवान शिव ने ही उन्हें अपनी जटाओं में धरा था। जिससे पृथ्वी का विनाश होने से बच गया था। इसलिए भी इस दिन को शिवरात्रि के रूप में मनाया जाता है और इस दिन शिवलिंग का अभिषेक भी किया जाता है।

ऐसी मान्यता भी है कि भगवान ने शिवरात्रि के दिन सदाशिव जो कि निराकार रूप हैं, उससे लिंग स्वरुप लिया था। इसलिए भक्त रात भर जागकर भगवान शिव की अराधना करते हैं।
हर चंद्र मास का चौदहवाँ दिन अथवा अमावस्या से पूर्व का एक दिन शिवरात्रि के नाम से जाना जाता है। एक कैलेंडर वर्श में आने वाली सभी शिवरात्रियों में से, महाशिवरात्रि, को सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना जाता है, जो फरवरी-मार्च माह में आती है। इस रात, ग्रह का उत्तरी गोलार्द्ध इस प्रकार अवस्थित होता है कि मनुष्य भीतर ऊर्जा का प्राकृतिक रूप से ऊपर की और जाती है। यह एक ऐसा दिन है, जब प्रकृति मनुष्य को उसके आध्यात्मिक शिखर तक जाने में मदद करती है। इस समय का उपयोग करने के लिए, इस परंपरा में, हम एक उत्सव मनाते हैं, जो पूरी रात चलता है। पूरी रात मनाए जाने वाले इस उत्सव में इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता है कि ऊर्जाओं के प्राकृतिक प्रवाह को उमड़ने का पूरा अवसर मिले – आप अपनी रीढ़ की हड्डी को सीधा रखते हुए – निरंतर जागते रहते हैं।

महाशिवरात्रि का महत्व
महाशिवरात्रि आध्यात्मिक पथ पर चलने वाले साधकों के लिए बहुत महत्व रखती है। यह उनके लिए भी बहुत महत्वपूर्ण है जो पारिवारिक परिस्थितियों में हैं और संसार की महत्वाकांक्षाओं में मग्न हैं। पारिवारिक परिस्थितियों में मग्न लोग महाशिवरात्रि को शिव के विवाह के उत्सव की तरह मनाते हैं। सांसारिक महत्वाकांक्षाओं में मग्न लोग महाशिवरात्रि को, शिव के द्वारा अपने शत्रुओं पर विजय पाने के दिवस के रूप में मनाते हैं। परंतु, साधकों के लिए, यह वह दिन है, जिस दिन वे कैलाश पर्वत के साथ एकात्म हो गए थे। वे एक पर्वत की भाँति स्थिर व निश्चल हो गए थे। यौगिक परंपरा में, शिव को किसी देवता की तरह नहीं पूजा जाता। उन्हें आदि गुरु माना जाता है, पहले गुरु, जिनसे ज्ञान उपजा। ध्यान की अनेक सहस्राब्दियों के पश्चात्, एक दिन वे पूर्ण रूप से स्थिर हो गए। वही दिन महाशिवरात्रि का था। उनके भीतर की सारी गतिविधियाँ शांत हुईं और वे पूरी तरह से स्थिर हुए, इसलिए साधक महाशिवरात्रि को स्थिरता की रात्रि के रूप में मनाते हैं।

महाशिवरात्रि का आध्यात्मिक महत्व
यौगिक परंपराओं में इस दिन का विशेष महत्व इसलिए भी है क्योंकि इसमें आध्यात्मिक साधक के लिए बहुत सी संभावनाएँ मौजूद होती हैं। आधुनिक विज्ञान अनेक चरणों से होते हुए, आज उस बिंदु पर आ गया है, जहाँ उन्होंने आपको प्रमाण दे दिया है कि आप जिसे भी जीवन के रूप में जानते हैं, पदार्थ और अस्तित्व के रूप में जानते हैं, जिसे आप ब्रह्माण्ड और तारामंडल के रूप में जानते हैं; वह सब केवल एक ऊर्जा है, जो स्वयं को लाखों-करोड़ों रूपों में प्रकट करती है। यह वैज्ञानिक तथ्य प्रत्येक योगी के लिए एक अनुभव से उपजा सत्य है। ‘योगी’ शब्द से तात्पर्य उस व्यक्ति से है, जिसने अस्तित्व की एकात्मकता को जान लिया है। जब मैं कहता हूँ, ‘योग’, तो मैं किसी विशेष अभ्यास या तंत्र की बात नहीं कर रहा। इस असीम विस्तार को तथा अस्तित्व में एकात्म भाव को जानने की सारी चाह, योग है। महाशिवारात्रि की रात, व्यक्ति को इसी का अनुभव पाने का अवसर देती है।

शिवरात्रि – महीने का सबसे ज्यादा अँधेरे से भरा दिन
शिवरात्रि माह का सबसे अंधकारपूर्ण दिवस होता है। प्रत्येक माह शिवरात्रि का उत्सव तथा महाशिवरात्रि का उत्सव मनाना ऐसा लगता है मानो हम अंधकार का उत्सव मना रहे हों। कोई तर्कशील मन अंधकार को नकारते हुए, प्रकाश को सहज भाव से चुनना चाहेगा। परंतु शिव का शाब्दिक अर्थ ही यही है, ‘जो नहीं है’। ‘जो है’, वह अस्तित्व और सृजन है। ‘जो नहीं है’, वह शिव है। ‘जो नहीं है’, उसका अर्थ है, अगर आप अपनी आँखें खोल कर आसपास देखें और आपके पास सूक्ष्म दृष्टि है तो आप बहुत सारी रचना देख सकेंगे। अगर आपकी दृष्टि केवल विशाल वस्तुओं पर जाती है, तो आप देखेंगे कि विशालतम शून्य ही, अस्तित्व की सबसे बड़ी उपस्थिति है। कुछ ऐसे बिंदु, जिन्हें हम आकाशगंगा कहते हैं, वे तो दिखाई देते हैं, परंतु उन्हें थामे रहने वाली विशाल शून्यता सभी लोगों को दिखाई नहीं देती। इस विस्तार, इस असीम रिक्तता को ही शिव कहा जाता है। वर्तमान में, आधुनिक विज्ञान ने भी साबित कर दिया है कि सब कुछ शून्य से ही उपजा है और शून्य में ही विलीन हो जाता है। इसी संदर्भ में शिव यानी विशाल रिक्तता या शून्यता को ही महादेव के रूप में जाना जाता है। इस ग्रह के प्रत्येक धर्म व संस्कृति में, सदा दिव्यता की सर्वव्यापी प्रकृति की बात की जाती रही है। यदि हम इसे देखें, तो ऐसी एकमात्र चीज़ जो सही मायनों में सर्वव्यापी हो सकती है, ऐसी वस्तु जो हर स्थान पर उपस्थित हो सकती है, वह केवल अंधकार, शून्यता या रिक्तता ही है। सामान्यतः, जब लोग अपना कल्याण चाहते हैं, तो हम उस दिव्य को प्रकाश के रूप में दर्शाते हैं। जब लोग अपने कल्याण से ऊपर उठ कर, अपने जीवन से परे जाने पर, विलीन होने पर ध्यान देते हैं और उनकी उपासना और साधना का उद्देश्य विलयन ही हो, तो हम सदा उनके लिए दिव्यता को अंधकार के रूप में परिभाषित करते हैं।

शिवरात्रि का महत्व
प्रकाश आपके मन की एक छोटी सी घटना है। प्रकाश शाश्वत नहीं है, यह सदा से एक सीमित संभावना है क्योंकि यह घट कर समाप्त हो जाती है। हम जानते हैं कि इस ग्रह पर सूर्य प्रकाश का सबसे बड़ा स्त्रोत है। यहाँ तक कि आप हाथ से इसके प्रकाश को रोक कर भी, अंधेरे की परछाईं बना सकते हैं। परंतु अंधकार सर्वव्यापी है, यह हर जगह उपस्थित है। संसार के अपरिपक्व मस्तिष्कों ने सदा अंधकार को एक शैतान के रूप में चित्रित किया है। पर जब आप दिव्य शक्ति को सर्वव्यापी कहते हैं, तो आप स्पष्ट रूप से इसे अंधकार कह रहे होते हैं, क्योंकि सिर्फ अंधकार सर्वव्यापी है। यह हर ओर है। इसे किसी के भी सहारे की आवश्यकता नहीं है। प्रकाश सदा किसी ऐसे स्त्रोत से आता है, जो स्वयं को जला रहा हो। इसका एक आरंभ व अंत होता है। यह सदा सीमित स्त्रोत से आता है। अंधकार का कोई स्त्रोत नहीं है। यह अपने-आप में एक स्त्रोत है। यह सर्वत्र उपस्थित है। तो जब हम शिव कहते हैं, तब हमारा संकेत अस्तित्व की उस असीम रिक्तता की ओर होता है। इसी रिक्तता की गोद में सारा सृजन घटता है। रिक्तता की इसी गोद को हम शिव कहते हैं। भारतीय संस्कृति में, सारी प्राचीन प्रार्थनाएँ केवल आपको बचाने या आपकी बेहतरी के संदर्भ में नहीं थीं। सारी प्राचीन प्रार्थनाएँ कहती हैं, “हे ईश्वर, मुझे नष्ट कर दो ताकि मैं आपके समान हो जाऊँ।“ तो जब हम शिवरात्रि कहते हैं जो कि माह का सबसे अंधकारपूर्ण दिन है, तो यह एक ऐसा अवसर होता है कि व्यक्ति अपनी सीमितता को विसर्जित कर के, सृजन के उस असीम स्त्रोत का अनुभव करे, जो प्रत्येक मनुष्य में बीज रूप में उपस्थित है।

महाशिवरात्रि – जागृति की रात
महाशिवरात्रि एक अवसर और संभावना है, जब आप स्वयं को, हर मनुष्य के भीतर बसी असीम रिक्तता के अनुभव से जोड़ सकते हैं, जो कि सारे सृजन का स्त्रोत है। एक ओर शिव संहारक कहलाते हैं और दूसरी ओर वे सबसे अधिक करुणामयी भी हैं। वे बहुत ही उदार दाता हैं। यौगिक गाथाओं में वे, अनेक स्थानों पर महाकरुणामयी के रूप में सामने आते हैं। उनकी करुणा के रूप विलक्षण और अद्भुत रहे हैं। इस प्रकार महाशिवरात्रि 2019 कुछ ग्रहण करने के लिए भी एक विशेष रात्रि है। यह हमारी इच्छा तथा आशीर्वाद है कि आप इस रात में कम से कम एक क्षण के लिए उस असीम विस्तार का अनुभव करें, जिसे हम शिव कहते हैं। यह केवल एक नींद से जागते रहने की रात भर न रह जाए, यह आपके लिए जागरण की रात्रि होनी चाहिए, चेतना व जागरूकता से भरी एक रात!

शिवरात्रि – अंधकार की रात्रि

सद्गुरु शिव की रात, शिवरात्रि के बारे में बता रहे हैं, वे समझाते हैं कि ये रात मानव शरीर को संपूर्ण बनाने के लिए एक शक्तिशाली संभावना प्रदान करती है।

चंद्रमाह की चतुर्दशी को अमावस्या से पहले की रात – महीने की सबसे अंधेरी रात होती है। उसे शिवरात्रि कहा जाता है। जब हम ‘शिव’ कहते हैं, तो उसका एक पहलू यह है कि हम आदियोगी, प्रथम योगी की बात कर रहे हैं। एक और पक्ष यह है कि ‘शिव’ शब्द का अर्थ है ’वह जो नहीं है।’ जो है, वह है सृष्टि। जो नहीं है, वह है शिव। आज, आधुनिक विज्ञान कहता है कि पूरी सृष्टि शून्य से निकली है और शून्य में चली जाएगी। सब कुछ शून्य से आता है और शून्य में ही चला जाता है। शून्य सृष्टि का आधार है। तो, हम शिव को अस्तित्व के आधार रूप में देख रहे हैं। ‘वह जो नहीं है’, उसका आधार वो है, जो मौजूद है।

अगर आप रात के आकाश को देखें, तो वहां अरबों तारे होते हैं, मगर वह महत्वपूर्ण नहीं है। तारों की संख्या से कहीं ज्यादा खाली जगह है। सृष्टि बहुत थोड़े से हिस्से में है। विशाल खालीपन या शून्यता बड़ी चीज़ है। उसी खालीपन की गोद में सृष्टि थमी हुई है। हम कहते हैं कि पूरी सृष्टि शिव की गोद में घटित हो रही है और शिव को ‘अंधकार’ कहते हैं। विडंबना यह है कि आधुनिक वैज्ञानिक इस अस्तित्व में हर चीज़ को थाम कर रखने वाली चीज़ को काली या अंधकारमय ऊर्जा कह रहे हैं। वे उसे अंधकारमय ऊर्जा इसलिए कह रहे हैं क्योंकि वे किसी और तरह से उसका वर्णन नहीं कर पा रहे और समझ नहीं पा रहे हैं कि उसकी प्रकृति क्या है। उन्हें बस शिव कहने की कमी है!

शिव का एक नाम भूतेश्वर भी है – यानी भूतों के स्वामी। पंच भूत आराधना जो हर शिवरात्रि को ध्यानलिंग में होती है, वह ध्यानलिंग में कृपा के उस आयाम तक पहुंचने के लिए है।
शिवरात्रि शब्द का अर्थ है, शिव की रात। उस दिन आपके शरीर में ऊर्जा कुदरती रूप से ऊपर की ओर चढ़ती है। इसका लाभ उठाने के लिए योग में एक खास साधना है। मूल रूप से, चाहे वह एक मानव शरीर हो या वृहत ब्रह्मांडीय निकाय, मुख्य रूप से वे पंच भूत या पांच तत्वों यानी पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश से ही बने हैं। जिसे आप ‘मैं’ कहते हैं, वह सिर्फ इन पांच तत्वों की शरारत है। अगर आप इस तंत्र, जिसे आप मनुष्य कहते हैं, की पूरी क्षमता को साकार करना चाहते हैं, या आप इसके परे जाकर विशाल ब्रह्मांडीय तंत्र के साथ एक होना चाहते हैं – चाहे आपकी आकांक्षा सिर्फ अपने सीमित व्यक्तित्व के लिए हो या सर्वव्यापी तत्व की – जब तक आपको जाने-अनजाने, चेतन या अचेतन रूप में इन पांच तत्वों पर एक निश्चित मात्रा में महारत नहीं होगी, तब तक आप न तो स्वयं के सुख को जान सकते हैं, न ब्रह्मांडीय प्राणी के आनंद को।
शिव का एक नाम भूतेश्वर भी है – यानी भूतों के स्वामी। पंच भूत आराधना जो हर शिवरात्रि को ध्यानलिंग में होती है, वह ध्यानलिंग में कृपा के उस आयाम तक पहुंचने के लिए है। पंच भूत आराधना एक शक्तिशाली संभावना पैदा करती है, जहां आप अपनी प्रणाली को एकीकृत कर सकते हैं और अपने शरीर में पंचतत्वों के अधिक बेहतर तरीके से जुड़ने के लिए उचित स्थिति पैदा कर सकते हैं।
एक शरीर से दूसरे में, ये पांच तत्व कितने बेहतर तरीके से जुड़े हुए हैं, यह उस व्यक्ति के बारे में करीब-करीब सब कुछ तय करता है। अगर इस शरीर को एक अधिक बड़ी संभावना के लिए सोपान बनना है, तो यह बहुत महत्वपूर्ण है कि हमारी प्रणाली ठीक से एकीकृत हो। जिस हवा में आप सांस लेते हैं, जो पानी पीते हैं, जो खाना खाते हैं, जिस धरती पर चलते हैं और जीवनी शक्ति के रूप में जीवन की अग्नि, इन सभी तत्वों से आपका शरीर बना है। अगर आप इन्हें नियंत्रित, जीवंत और केंद्रित रखते हैं तो दुनिया में सेहत, खुशहाली और सफलता मिलनी ही है। मेरी कोशिश है कि तरह-तरह के साधन बनाए जाएं, जो लोगों के लिए इसे इस तरह संभव बनाए कि आपके मौजूद होने का तरीका ही पंच भूत आराधना हो।

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