रेल्वे को मौब मैनेजमेंट सीखनी होगी-अजीत सिन्हाभगदड़ में जान गवांने वाले परिजनों के प्रति संवेदना प्रकट करता हूँ

रेल्वे को मौब मैनेजमेंट सीखनी होगी-अजीत सिन्हा
भगदड़ में जान गवांने वाले परिजनों के प्रति संवेदना प्रकट करता हूँ
नई दिल्ली – नई दिल्ली रेल्वे स्टेशन भगदड़ कांड से आहत कई सामाजिक संगठनों से नाता रखने वाले अजीत सिन्हा ने मर्माहत होकर अपनी संवेदना प्रकट करते हुए कहा कि भारतीय रेल्वे के तीन मूलभूत सिद्धांत या आदर्श कई रेल्वे स्टेशनों पर आज भी लिखे हुए दिख जाते हैं जिसमें संरक्षा, सुरक्षा और समय पालन जैसे शब्द आज पब्लिक को चिढ़ाने का कार्य कर रही है, पता नहीं आज रेल्वे किस तरह से यात्रियों को संरक्षा दे रही है यह समझ से परे है और सुरक्षा के तो क्या कहने हैं कहीं चलती रेल के डिब्बों पर पत्थर फेंकने के वीडियो या रेल के डिब्बों की खिड़कियों को चकनाचूर करने की घटना से संबंधित वीडियो, कहीं डिरेलमेंट की घटना, कहीं दो रेल गाडियों को आपस में लड़ने की घटना और आज की भगदड़ की घटना तो अवश्य ही रेल विभाग पर सवालिया निशान उत्पन्न करती है।
एक वो समय था जब कभी अमरत्व को प्राप्त लाल बहादुर शास्त्री जी रेल मंत्री हुआ करते थे और उनके समय हुई दुर्घटना की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुये रेल मंत्री के पद से त्यागपत्र दे दिया था लेकिन पता नहीं आज नैतिकता कहां खो गई है और रेल मन्त्रालय के उच्च पदों पर बैठे मंत्री – अधिकारियों की नैतिकता कहां चली गई है? ये विचरणीय है क्योंकि विकासवाद की आड़ में जिस तरह से नैतिक पतन हो रही है उसे थोथी विकासवाद की संज्ञा देनी ही ठीक रहेगी।
आज जिस तरह से सड़क या रेल्वे का नेटवर्क बढ़ा है और आबादी के अनुपात में दुर्घटनाएं भी बढ़ी हैं, जहाँ रेल्वे अपनी सुविधाओं में इजाफा किये हैं वहीं बेतहासा यात्रा शुल्क भी बढ़ी है लेकिन प्रश्न ये उठता है कि क्या रेल्वे मूलभूत सुविधाओं को मयस्सर कराने में अपने मूलभूत सिद्धांत को भूल चुका है। हमारे रेल्वे मंत्री बहुत ही पढ़े-लिखे व्यक्ति हैं और उनकी गिनती जीनियस व्यक्तियों में होती है लेकिन ऐसी जीनियसिटी पर सवाल उठना तो लाजमी है जब ऐसी घटनायें या दुर्घटनाएं हो जाती है। और नैतिक पतन तो अधिकतर राजनीतिज्ञों की हो ही चुकी है चाहे वे सत्ता में हों या सत्ता के बाहर।
बहरहाल ऐसी घटनाओं के लिए कमेटियां भी बनेगी और अधिकारियों – कर्मचारियों पर गाज भी गिरेगी और रेल्वे सम्वेदनाएं भी प्रकट करेगी लेकिन बड़ी प्रश्न ये है कि जिनके परिजन दिवंगत हो गये हैं, क्या उन्हें कोई वापस ला सकता है क्या? रेल्वे के मापदंडों के अनुसार परिजनों को मुआवजा भी मिल जाएगी लेकिन उन मुवावजे से गये लोंगो की कमी की क्षतिपूर्ति रेल्वे कर सकता है क्या?
यदि सरकारी तंत्र लोंगो को सुरक्षा देने में विफल है तो सुरक्षा देने की दंभ आखिर रेल्वे क्यों भरती है, ये एक यक्ष प्रश्न है जिसकी जवाब रेल मंत्री को देनी ही चाहिए और मंत्रियों के नेतृत्व कर्ता प्रधानमंत्री जी को भी। ये देखनी होगी कि आखिर सुरक्षा में कहां कमी रह जाती है जिसका खामियाजा निरीह यात्रियों को भुगतनी पडती है।
जिस तरह से जनसंख्या में वृद्धि हो रही है और अवसरों पर भीड़ इक्कठे होते हैं उसके लिये मौब मैनेजमेंट की पढ़ाई अधिकारीयों – पदाधिकारियों, प्राशासनिक अधिकारियों, कर्मचारियों को देने की जरूरत है ताकि ऐसी हृदयविदारक घटनाओं पर विराम लगे तथा ऐसी घटनाओं के जिम्मेदार लोंगो पर दंडात्मक कारवाई के साथ आर्थिक दंड भी सुनिश्चित करने की जरूरत है और आततायी तत्त्वों के खिलाफ कमर कस उन्हें कठोर दंड देने की भी जरूरत है।
आगे अजीत सिन्हा ने नई दिल्ली रेल्वे स्टेशन पर दुर्घटना में दिवंगत सभी के प्रति अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए प्रत्येक भुक्तभोगी के लिए एक करोड़ की राशि मुवावजे के तौर पर मांग की है।


