“वक़्फ़ बचाओ, दस्तूर बचाओ” आंदोलन बना संविधान और न्याय की नई आवाज़ — मुर्शीद आलम
“वक़्फ़ बचाओ, दस्तूर बचाओ” आंदोलन बना संविधान और न्याय की नई आवाज़ — मुर्शीद आलम
पटना ।

इतिहास ने एक बार फिर गांधी मैदान को गवाह बनाया — जब लाखों लोगों ने ‘वक़्फ़ बचाओ, दस्तूर बचाओ’ के नारे के साथ लोकतंत्र की रक्षा के लिए हुंकार भरी। इस ऐतिहासिक जनसभा में सीमांचल से लेकर मिथिलांचल तक, मगध से लेकर कोशी तक के गांव-गांव से इंसाफ़पसंद जनता उमड़ पड़ी।
AIMIM अररिया के जिला अध्यक्ष और जोकीहाट विधानसभा सीट से भावी प्रत्याशी जनाब मो. मुर्शीद आलम ने इस आंदोलन को “सिर्फ एक विरोध नहीं, बल्कि चेतावनी” बताया। उन्होंने कहा:
> “अगर वक़्फ़ संपत्तियों पर हस्तक्षेप नहीं रोका गया और संविधान के मूल ढांचे से छेड़छाड़ बंद नहीं हुई, तो यह देशभर में जनआंदोलन की ज्वाला बन जाएगा।”
वक़्फ़ की हिफाज़त = संविधान की हिफाज़त
मुर्शीद आलम ने कहा कि
> “यह आंदोलन किसी एक समुदाय की नहीं, भारत के लोकतांत्रिक अस्तित्व की लड़ाई है। वक़्फ़ संपत्तियाँ सिर्फ मज़हबी नहीं, सामाजिक न्याय की धरोहर हैं — जिनसे स्कूल, कॉलेज, मदरसे, अस्पताल और ग़रीबों की ज़रूरतें पूरी होती हैं। इनकी लूट न सिर्फ अवैध, बल्कि अमानवीय भी है।”
मोबाइल की टॉर्च बनी ‘संविधान बचाओ’ का प्रतीक
सभा की एक खास बात रही — लाखों लोगों ने अपने मोबाइल की टॉर्च जलाकर एक प्रतीकात्मक प्रकाशपुंज तैयार किया, जिसने यह साफ़ कर दिया कि संविधान अब केवल काग़ज़ों में नहीं, बल्कि जनता की नसों में बहता है।
वक्ताओं की एकजुट आवाज़: धर्म से ऊपर, ज़िम्मेदारी का सवाल
सभा में मौलाना फैसल रहमानी समेत कई धार्मिक, सामाजिक व राजनीतिक नेताओं ने भाग लिया और इस बात पर जोर दिया कि वक़्फ़ की हिफाज़त सिर्फ धार्मिक नहीं, राष्ट्रीय सामाजिक ज़िम्मेदारी है।
हर उम्र, हर वर्ग की गूंजती भागीदारी
जनसभा में बच्चों, महिलाओं, युवाओं, बुज़ुर्गों और पेशेवर वर्गों की बड़ी उपस्थिति यह दर्शा रही थी कि यह आंदोलन अब “राजनीति की परिधि” से बाहर निकलकर जन-मन की पुकार बन चुका है।
मुर्शीद आलम का आभार और संदेश
सभा के समापन पर मुर्शीद आलम ने सीमांचल और बिहार के सभी जिलों से आए प्रतिभागियों को हृदय से धन्यवाद दिया।
उन्होंने कहा:
> “जनाब मौलाना फैसल रहमानी साहब , अख्तरूल ईमान साहब आदि ने इस सभा को जो रूहानी और वैचारिक ऊर्जा दी, वह बेमिसाल है। मैं उन्हें दिल से मुबारकबाद देता हूं।”
गांधी मैदान से उठी चेतावनी देशभर में गूंजेगी
यह सभा सिर्फ एक आयोजन नहीं, एक आगाज़ थी।
यह इशारा था कि
अब कोई भी कानून या नीति जनता की सहमति के बिना नहीं चलेगी
वक़्फ़ और संविधान की रक्षा अब एक जनांदोलन का रूप ले चुकी है
और जनता अब नींद से नहीं, नेतृत्व से जाग रही है।


