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सड़क नहीं, तो वोट नहीं!” — बसंतपुर के ग्रामीणों का फूटा आक्रोश, 2025 चुनाव में बहिष्कार की चेतावनी

सड़क नहीं, तो वोट नहीं!” — बसंतपुर के ग्रामीणों का फूटा आक्रोश, 2025 चुनाव में बहिष्कार की चेतावनी

सड़क नहीं, तो वोट नहीं!” — बसंतपुर के ग्रामीणों का फूटा आक्रोश, 2025 चुनाव में बहिष्कार की चेतावनी

अररिया के बसंतपुर पंचायत में मानसून बना मुसीबत, 10 साल से सड़क का इंतज़ार कर रहे ग्रामीण बोले – अब नहीं सहेंगे उपेक्षा, अधिकार के लिए सड़क पर उतरेंगे

अररिया।

बिहार के अररिया प्रखंड अंतर्गत बसंतपुर पंचायत के वार्ड नंबर-3 के ग्रामीणों की पीड़ा अब आंदोलन में बदलने लगी है। जहां देश डिजिटल इंडिया और स्मार्ट सिटी की ओर बढ़ रहा है, वहीं यह गांव आज भी सड़क जैसे मूलभूत अधिकार से वंचित है।

मानसून के आते ही इस गांव के हालात आपदा क्षेत्र जैसे बन जाते हैं। मुख्य सड़क से टोला-मोहल्ला तक कोई संपर्क पथ नहीं होने की वजह से बारिश के दिनों में यहां बाढ़ जैसी स्थिति बन जाती है। दो-दो महीने तक तेज पानी के बहाव के कारण गांव का संपर्क पूरी तरह टूट जाता है।

गरीबी + दुर्दशा = संकट

गांव में ज़्यादातर परिवार गरीब मजदूर वर्ग से हैं, जिनका रोज़गार, शिक्षा, चिकित्सा — सब कुछ अररिया जिला मुख्यालय पर निर्भर करता है। सड़क न होने से:

बच्चे और खासकर बेटियां स्कूल नहीं जा पातीं — शिक्षा अधूरी रह जाती है।

गर्भवती महिलाएं और बीमार लोग समय पर अस्पताल नहीं पहुंच पाते — कई बार जान पर बन आती है।

मजदूरी करने वाले लोग काम पर नहीं जा पाते — परिवार को भूखे सोना पड़ता है।

10 साल से जारी इंतज़ार, अब आंदोलन तय!

ग्रामीणों का कहना है कि पिछले एक दशक से सिर्फ आश्वासन मिलते आए हैं, काम नहीं। अब उनके सब्र का बांध टूट चुका है।

> “रोड नहीं, तो वोट नहीं — अबकी बार आर-पार की लड़ाई होगी।”
— गांव के बुजुर्ग मो. नईमुद्दीन

ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि अगर इस बार भी इस सड़क निर्माण को लेकर ठोस निर्णय नहीं लिया गया, तो 2025 के विधानसभा चुनाव का वोट बहिष्कार किया जाएगा। साथ ही पचकौड़ी चौक से रामपुर तक सड़क जाम और धरना प्रदर्शन किया जाएगा।

प्रशासन से सवाल:

> क्या एक दशक पुराना संघर्ष यूं ही अनसुना रहेगा?
क्या लोकतंत्र सिर्फ शहरी लोगों का अधिकार है?

मौलिक अधिकार की पुकार

ग्रामीणों का कहना है कि हम भारत के नागरिक हैं, और सड़क जैसी बुनियादी सुविधा मांगना कोई एहसान नहीं, बल्कि हमारा संवैधानिक हक है।

चेतावनी की यह आवाज़ अब सिर्फ गांव की नहीं, बल्कि लोकतंत्र की परीक्षा बन चुकी है। क्या सरकार इस पुकार को सुनेगी, या फिर एक और गांव विकास की दौड़ से बाहर छूट जाएगा?

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