
दिल्ली एवं एनसीआर
कभी-कभी न अंतरतम इतना अधिक गूंथा हुआ होता है कि कुछ भी समझ
कभी-कभी न अंतरतम इतना अधिक गूंथा हुआ होता है कि कुछ भी समझ
आहिस्ता-आहिस्ता

कभी-कभी न
अंतरतम
इतना अधिक
गूंथा हुआ होता है
कि कुछ भी समझ
नहीं आता
कि दर्द कहाँ छुपा बैठा है
कहाँ महसूस हो रहा है ?
बैचेनी भी कहाँ है ?
और घुटन,
घुटन-सी भी क्यों
महसूस हो रही है।
मैं यह सब समझ ही
नहीं पाती हूँ.
अजीब-सी उलझन,
अजीब-सा मन,
मन कुछ कहता है
और
अधरन न जाने कुछ ही
बुदबुदाते रहते है,
फिर शब्दों का मौन
किसी गहरे समंदर
में बैठा हुआ है
अन्दर ही अन्दर कसमसाता-सा
वहीं पलकों के कोरों
में छुपी बैठी नमी
उभरते आसुंओं को
कहीं से दबाकर
पीछे धकेलती-सी….
बस तुम्हारी बाट जोहती
किसी आग्नेयगिरी की तरह,
एकदम से फटकर
बह जाने को तत्पर
कितना कुछ समेटे हुये,
ये अंतर्मन भर गया है
किन्तु–
कई बार तो थोड़ा-सा
छलक जाता है,
मगर आहिस्ता-आहिस्ता
बिना किसी को
नजर आये…!!
डॉ. पल्लवी सिंह ‘अनुमेहा’
लेखिका एवं कवयित्री
बैतूल, मध्यप्रदेश



