
आज का विचार : अंधी प्रतिस्पर्धा के दौर में सच्ची जीत
आज का विचार : अंधी प्रतिस्पर्धा के दौर में सच्ची जीत
आज का विचार : अंधी प्रतिस्पर्धा के दौर में सच्ची जीत

आज का समय तेज़ रफ्तार का समय है। हर व्यक्ति आगे निकलना चाहता है—बेहतर नौकरी, बड़ा पद, ज़्यादा पैसा, समाज में पहचान और प्रभाव। इसमें कई बार लोग यह भूल जाते हैं कि जीत केवल मंज़िल तक पहुँचने का नाम नहीं है, बल्कि उस रास्ते का भी महत्व है जिससे हम वहाँ तक पहुँचते हैं। आसान शब्दों में कहें तो आज की सबसे बड़ी समस्या यह बन गई है—जीत हर हाल में चाहिए, चाहे तरीका सही हो या गलत।। लेकिन इस आगे बढ़ने की चाह ने पेशेवर जीवन को एक सफलता की अंतहीन अंधी प्रतिस्पर्धा में बदल दिया है। इस होड़ में कई बार लक्ष्य तो साफ़ होता है, लेकिन रास्ता गलत हो जाता है।
अंधी प्रतिस्पर्धा क्या है?
अंधी प्रतिस्पर्धा वह स्थिति है, जहाँ व्यक्ति दूसरों से आगे निकलने की चाह में अपने मूल्यों, नैतिकता और मानसिक संतुलन को पीछे छोड़ देता है। इस दौड़ में लगातार तुलना होती रहती है, संतोष की भावना समाप्त हो जाती है और जीत हर हाल में चाहिए की सोच हावी हो जाती है। धीरे-धीरे यह सोच व्यक्ति को मानसिक तनाव, असंतोष और अनैतिक निर्णयों की ओर ले जाती है।
जीत की बेलगाम दौड़ और गलत रास्ते
आज पेशेवर दुनिया में यह मान्यता बढ़ रही है कि परिणाम सबसे महत्वपूर्ण है, चाहे साधन कुछ भी हों। इसी सोच के कारण शॉर्टकट अपनाए जाते हैं, दूसरों के श्रेय को अपना बताया जाता है और नियमों और मूल्यों से समझौता किया जाता है। ऐसी सफलता बाहर से भले ही आकर्षक लगे, लेकिन भीतर से व्यक्ति को अस्थिर और भयभीत बना देती है। हर समय यह डर बना रहता है कि कहीं सच्चाई सामने न आ जाए।
बाहरी सफलता और आत्म-विजय का अंतर
महात्मा बुद्ध का विचार आज के पेशेवर युग में विशेष महत्व रखता है—
“हजार लड़ाइयों को जीतने से बेहतर है खुद को जीतना। तब जीत हमेशा तुम्हारी होगी। इसे तुमसे कोई नहीं छीन सकता।”
यह कथन केवल एक आध्यात्मिक संदेश नहीं, बल्कि आज के व्यस्त और प्रतिस्पर्धात्मक जीवन के लिए एक व्यावहारिक जीवन-दर्शन भी है। सामान्यतः हम जीवन में सफलता को बाहरी उपलब्धियों से जोड़कर देखते हैं—प्रतिस्पर्धा में जीत, धन-संपत्ति, पद, प्रतिष्ठा या दूसरों पर विजय। लेकिन बुद्ध हमें यह सिखाते हैं कि वास्तविक और स्थायी विजय बाहर नहीं, हमारे भीतर होती है।खुद को जीतना, दूसरों को हराने से कहीं बड़ी जीत है।
आत्म-विजय का अर्थ है अपने क्रोध पर नियंत्रण, अपनी इच्छाओं पर संयम, अपने भय, आलस्य, ईर्ष्या, अहंकार और नकारात्मक सोच पर विजय पाना। बाहरी शत्रु को हराना आसान हो सकता है, लेकिन अपने भीतर छिपी कमजोरियों से लड़ना सबसे कठिन कार्य होता है। जो व्यक्ति अपनी बुरी आदतों और नकारात्मक प्रवृत्तियों को पहचान कर उन्हें सुधार लेता है, वही सच्चे अर्थों में विजेता होता है।
पेशेवर जीवन में आत्म-संयम की भूमिका
आज के समय में व्यक्ति निरंतर तनाव, प्रतिस्पर्धा और असंतोष से घिरा हुआ है। ऑफिस की भागदौड़, सामाजिक तुलना, बढ़ती अपेक्षाएँ और असफलता का डर मन को अशांत कर देता है। ऐसे में यदि व्यक्ति दूसरों को दोष देने के बजाय स्वयं के भीतर झाँककर आत्म-सुधार का मार्ग अपनाए, तो जीवन की आधी समस्याएँ स्वतः समाप्त हो सकती हैं। जो व्यक्ति स्वयं पर नियंत्रण रखता है, वह विपरीत परिस्थितियों में भी संयम नहीं खोता। वह हार से टूटता नहीं और सफलता में अहंकारी नहीं बनता। आत्म-विजय से आत्मविश्वास जन्म लेता है, और यही आत्मविश्वास जीवन की हर चुनौती का सामना करने की शक्ति देता है। आत्म-संयम रखने वाला प्रोफेशनल धीरे लेकिन मजबूती से आगे बढ़ता है, विश्वास और ईमानदारी की नींव पर करियर बनाता है, तनाव में भी विवेक नहीं खोता और लंबे समय तक सम्मान अर्जित करता है। ऐसे व्यक्ति की पहचान उसके पद से नहीं, बल्कि उसके आचरण से होती है।
अस्थायी और स्थायी सफलता का अंतर
गलत तरीकों से प्राप्त सफलता जल्दी मिलती है, लेकिन उतनी ही जल्दी समाप्त हो जाती है और पीछे पछतावा छोड़ जाती है
वहीं ईमानदारी और परिश्रम से प्राप्त सफलता समय लेती है, लेकिन टिकाऊ होती है और आत्म-संतोष देती है।
सच्ची पेशेवर सफलता की पहचान
वास्तविक सफलता वह है जिसमें व्यक्ति मानसिक शांति के साथ जीवन जी सके. अपने निर्णयों पर गर्व कर सके , असफलता से सीख ले सके और सफलता में विनम्र बना रहे।
अंत में मैं यही कहना चाहता हूं कि आज की अंधी प्रतिस्पर्धा के दौर में सबसे बड़ी समझदारी यह है कि हम दूसरों को पछाड़ने से पहले खुद को बेहतर बनाएं। जीत अवश्य हासिल करें, लेकिन सही मार्ग से।क्योंकि पेशेवर जीवन की सबसे बड़ी जीत वही है, जिसमें इंसान अपनी नैतिकता, आत्म-सम्मान और इंसानियत को न खोए।
लेखक:
Vishamber Shokeen
(विशम्बर शौकीन)
कंपनी सचिव एवं रेरा सलाहकार
981193212



