
बचपन की दोस्ती: साझा खुशियाँ और बाँटे हुए सपने
बचपन की दोस्ती: साझा खुशियाँ और बाँटे हुए सपने
बचपन की दोस्ती: साझा खुशियाँ और बाँटे हुए सपने

बचपन की दोस्ती जीवन का वह अनमोल अध्याय है, जहाँ न कोई स्वार्थ होता है, न कोई अपेक्षा। उस उम्र में दोस्ती केवल साथ खेलने, हँसने और छोटी-छोटी बातों पर रूठने-मनाने तक सीमित होती है, लेकिन उसके प्रभाव जीवन भर साथ चलते हैं। बचपन के दोस्त हमारे पहले साथी होते हैं, जिनके साथ हम अपनी दुनिया गढ़ते हैं।
स्कूल की घंटी, कक्षा की शरारतें, टिफ़िन बाँटना, छुट्टी के बाद मैदान में खेलना—इन सबमें खुशियाँ साझा होती थीं। किसी एक को डाँट पड़ती तो सबका मन उदास हो जाता, और किसी एक की जीत पूरे समूह की जीत बन जाती। यही तो बचपन की दोस्ती की खूबसूरती है—जहाँ खुशी बाँटने से बढ़ती है और दुःख बाँटने से घटता है।
उस समय सपने भी साझा होते थे। कोई डॉक्टर बनना चाहता था, कोई सैनिक, तो कोई अध्यापक। हम सब अपने-अपने सपनों को एक-दूसरे से जोड़ लेते थे और विश्वास करते थे कि बड़े होकर सब कुछ संभव होगा। उन सपनों में न प्रतिस्पर्धा थी, न ईर्ष्या—बस एक-दूसरे के लिए आगे बढ़ने की प्रेरणा थी।
बचपन की दोस्ती हमें सिखाती है कि रिश्ते दिल से निभाए जाते हैं, हिसाब-किताब से नहीं। समय के साथ रास्ते बदल जाते हैं, शहर बदल जाते हैं, पर जब वर्षों बाद वही दोस्त मिलते हैं तो कुछ पल में ही बचपन लौट आता है। वही हँसी, वही अपनापन और वही सादगी।
वास्तव में, बचपन की दोस्ती हमारी भावनात्मक नींव है। यह हमें विश्वास, सहयोग और सच्चे प्रेम का अर्थ समझाती है। साझा खुशियाँ और बाँटे हुए सपने भले ही समय के साथ आकार बदल लें, लेकिन उनकी स्मृतियाँ जीवन भर मन को सुकून देती रहती हैं। यही कारण है कि बचपन की दोस्ती कभी पुरानी नहीं होती—वह हमेशा दिल में ज़िंदा रहती है।
अनिल माथुर
ज्वाला-विहार, जोधपुर।



