बिहार एवं झारखंड

अरावली खनन व पर्यावरण प्रदूषण के विकराल दौर में पंच परिवर्तन अत्यंत प्रासंगिक : डॉ शैलेश

अरावली खनन व पर्यावरण प्रदूषण के विकराल दौर में पंच परिवर्तन अत्यंत प्रासंगिक : डॉ शैलेश

अरावली खनन व पर्यावरण प्रदूषण के विकराल दौर में पंच परिवर्तन अत्यंत प्रासंगिक : डॉ शैलेश

♦️भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाने की आवश्यकता नही है, यह पहले से ही हिन्दू राष्ट्र है और आगे भी रहेगा – जे. नंद कुमार

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष पर डीएवी पीजी कॉलेज में राष्ट्रीय संगोष्ठी का हुआ शुभारंभ

वाराणसी I

जहाँ एक ओर अरावली की पहाड़ियों में हो रहे अवैध खनन से पर्यावरण प्रदूषण विकराल रूप धारण करता जा रहा है, उस दौर में “पंच परिवर्तन : स्वदेशी, सामाजिक समरसता, नागरिक कर्तव्य, कुटुंब प्रबोधन और पर्यावरण” की प्रासंगिकता और भी बढ़ गई है। पंच परिवर्तन का सिद्धांत नया नही है, बस इसे ठीक ढंग से बताया नही गया। यह हमारी सोच को संकुचित नही बल्कि वैश्विक बनाता है, धरती माता को बचाने के लिए हमें पंच परिवर्तन को आत्मसात करना होगा। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एक ऐसा संगठन है जो अपनी वर्षगाँठ मनाने के बजाय आत्मचिंतन करता है कि निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति हुई है या नहीं।
उक्त उद्गार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में डीएवी पीजी कॉलेज वाराणसी में आयोजित ‘पंच परिवर्तन एवं भविष्य का भारत’ विषयक दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के तकनीकी सत्र में डी.बी. कॉलेज जयनगर के युवा शिक्षाविद् डॉ. शैलेश कुमार सिंह ने अध्यक्षता करते हुए व्यक्त किया।
आईसीएसएसआर, नई दिल्ली द्वारा प्रायोजित संगोष्ठी में प्रज्ञा प्रवाह के राष्ट्रीय समन्वयक, मुख्य अतिथि जे. नन्द कुमार ने कहा कि यह शताब्दी सिर्फ एक संगठन का सौ वर्ष नही है बल्कि यह भारतीय संस्कृति के पुनर्जागरण का साक्षी बन रहा है। यह नवोत्थान का क्षण है, यह प्रतिमान परिवर्तन का क्षण है। उन्होंने यह भी कहा की भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाने की आवश्यकता नही है, यह पहले से ही हिन्दू राष्ट्र है और आगे भी हिन्दू राष्ट्र ही रहेगा।
अध्यक्षता करते हुए साउथ एशिया विश्वविद्यालय के प्रेसिडेंट प्रो. के.के. अग्रवाल ने कहा कि पंच परिवर्तन सिर्फ एक शब्द नही है बल्कि संघ के सिद्धांतों को समेकित करने का मूलमंत्र है। यदि भारत को विश्वगुरु बनाना है तो संघ के विचारों को आत्मसात करना ही होगा।
विशिष्ट वक्ता प्रज्ञा प्रवाह के केंद्रीय समिति के सदस्य रामाशीष जी ने कहा कि कुंठित मन, संकुचित हृदय और बंधा हुआ हाथ राष्ट्र का निर्माण नही कर सकते। भारतीय युवा राम से प्रेरणा लेकर समभाव वाले बने। अतिथियों ने संगोष्ठी की स्मारिका का विमोचन भी किया।
इसके पूर्व अतिथियों का स्वागत महाविद्यालय के प्रबंधक अजीत सिंह यादव ने स्मृति चिन्ह, अंगवस्त्र एवं पुष्प गुच्छ प्रदान कर किया। संगोष्ठी के पहले दिन विभिन्न सत्रों में 24 से अधिक विद्वानों ने विचार रखें। इनमें पूर्व कुलपति प्रो.अजय कुमार सिंह, पूर्व कुलपति प्रो. एच.के. सिंह, पूर्व कुलपति प्रो. राजाराम यादव, प्रो. टी.पी. सिंह, प्रो. एसके दुबे, प्रो. पीएन सिंह, अजय कुमार, डॉ. अनिल सिंह, प्रो. जयशंकर पाण्डेय, डॉ स्मिता सिंह, डॉ शिव जी वर्मा, डॉ गौतम कोहली, डॉ रतिंदर कौर सहित अन्य वक्ता शामिल रहे। इसके अलावा पहले दिन 8 सत्रों में 100 से अधिक शोधपत्र प्रस्तुत किये गए। देश के सभी राज्यो से शोधपत्र प्रस्तुत हुए। स्वागत भाषण डॉ. पारुल जैन एवं धन्यवाद ज्ञापन कार्यवाहक प्राचार्य प्रो.मिश्रीलाल ने दिया। संयोजन डॉ. शान्तनु सौरभ एवं सह संयोजन डॉ. सिद्धार्थ सिंह एवं संचालन डॉ. रमेन्द्र सिंह ने किया। उप प्राचार्य द्वय प्रो.संगीता जैन एवं प्रो. राहुल भी उपस्थित रहे।

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