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हरजोरा में पक्षियों का नरसंहार: पूर्व विधायक और आलमनगर के एक नेता का नाम सामने आते ही सियासी भूचाल, वन विभाग की लापरवाही पर बढ़ी चिंता

हरजोरा में पक्षियों का नरसंहार: पूर्व विधायक और आलमनगर के एक नेता का नाम सामने आते ही सियासी भूचाल, वन विभाग की लापरवाही पर बढ़ी चिंता

राजनीतिक संरक्षण, प्रशासनिक ढिलाई, हथियार तस्करी और अंतरराष्ट्रीय शिकार रैकेट की संभावना, आरोपियों पर कार्रवाई में हो रही देरी

हरजोरा में पक्षियों का नरसंहार: एक अपराध या एक साजिश?

भागलपुर।

हरजोरा घाट में पिछले साल हुए पक्षियों के नरसंहार ने केवल वन्यजीव संरक्षण के मुद्दे को ही नहीं, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही, राजनीतिक संरक्षण, हथियार तस्करी और अवैध शिकार के नेटवर्क को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। शिकारियों के खिलाफ स्पष्ट सबूतों के बावजूद कार्रवाई में हो रही देरी और आरोपियों के बचाव में राजनीतिक हस्तक्षेप ने इसे कानूनी और राजनीतिक मोर्चे पर एक गंभीर संकट बना दिया है। आरोपियों की पहचान और शिकारियों के खिलाफ साक्ष्य होने के बावजूद प्रशासन की निष्क्रियता ने इस मामले की गंभीरता को और बढ़ा दिया है।

आरोपियों पर कार्रवाई में देरी, प्रशासनिक ढिलाई

हरजोरा मामले में शिकारियों की गाड़ी का नंबर, तस्वीरें और अन्य सबूतों के बावजूद स्थानीय प्रशासन और वन विभाग द्वारा कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है। सूत्रों के अनुसार, आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई में लगातार हो रही देरी प्रशासनिक ढिलाई को दर्शाती है। ये सवाल उठ रहे हैं कि क्या आरोपियों को राजनीतिक संरक्षण मिल रहा है? इसके बावजूद कि साक्ष्य सबूतों के रूप में मौजूद हैं, यह स्पष्ट है कि प्रशासनिक लापरवाही और दबाव के कारण दोषियों के खिलाफ कोई ठोस कदम नहीं उठाए जा रहे हैं।

पूर्व विधायक और आलमनगर के नेता का नाम सामने आना

इस मामले में राजद के पूर्व विधायक और आलमनगर विधानसभा क्षेत्र के एक नेता का नाम सामने आ रहा है। यह नेता शिकारियों को शरण देने और इस मामले में सक्रिय रूप से शामिल होने के आरोपों में घिरे हैं। पूर्व विधायक पहले भी डीएसपी सतपाल सिंह हत्याकांड में आरोपी रहे थे, लेकिन प्रशासन की नाकामी और साक्ष्य की कमी के कारण वे बच निकले थे। अब वही नेता फिर से इस शिकार कांड में उभरकर सामने आए हैं, और यह स्थिति यह संकेत देती है कि राजनीति के प्रभाव में आकर वे हर बार बचते आए हैं।

इसके अलावा, आलमनगर के एक नेता का भी नाम सामने आया है जो कैंची छाप चुनाव चिन्ह से पूर्व विधानसभा चुनाव में भाग ले चुके थे। यह नेता शिकारियों को शरण देने के आरोपों में घिरे हैं, जो इस बात को साबित करते हैं कि अपराधियों का नेटवर्क राजनीतिक रूप से संरक्षित हो सकता है।

प्रशासन की निष्क्रियता और राजनीतिक दबाव

अब सवाल यह उठता है कि प्रशासन और वन विभाग इन साक्ष्यों के बावजूद आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं कर रहे हैं। सूत्रों के मुताबिक, आरोपियों के राजनीतिक कनेक्शन और नेताओं के दबाव के कारण कार्रवाई में देरी हो रही है। इससे यह साफ होता है कि राजनीतिक संरक्षण और प्रशासनिक ढिलाई मिलकर अपराधियों को बचाने में सक्रिय रूप से मदद कर रहे हैं। इसका सीधा असर वन्यजीव संरक्षण और कानूनी न्याय पर पड़ रहा है।

अंतरराष्ट्रीय शिकार रैकेट का कनेक्शन?

इस मामले में एक और दिलचस्प कोण सामने आया है। शिकारियों की गिरफ्तारी के बाद एक बार बाला का नाम भी सामने आया है, जो शिकारियों से पैसे और धमकियों के कारण चुप रही। बार बाला फिलहाल पुलिस की गिरफ्त से बाहर है, और उसकी तलाश की जा रही है। इसके अलावा, यह संभावना जताई जा रही है कि इस शिकार कांड का एक अंतरराष्ट्रीय शिकार रैकेट से कनेक्शन हो सकता है, जो अवैध शिकार, हथियारों की तस्करी और शिकारियों के नेटवर्क के रूप में एक बड़े व्यापार का हिस्सा हो सकता है। इसके माध्यम से होने वाले मुनाफे को देखते हुए यह मामला कहीं न कहीं वैश्विक स्तर पर भी महत्वपूर्ण बनता जा रहा है।

जांच और कार्रवाई में तेजी लाने का आदेश

भागलपुर के प्रमंडलीय आयुक्त ने इस मामले में सख्त कार्रवाई का आदेश दिया है, और जिला पदाधिकारी को मामले की गति को तेज करने के निर्देश जारी किए हैं। इसके साथ ही, मधेपुरा के आरक्षी अधीक्षक द्वारा दी गई रिपोर्ट ने इस मामले में नया मोड़ लिया है, जिससे यह मामला उच्च न्यायालय और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल कोलकाता के भी संज्ञान तक जा सकता है।

निष्कर्ष: क्या असली अपराधियों को मिलेगी सजा?

हरजोरा का पक्षी नरसंहार न केवल वन्यजीव संरक्षण के लिए एक बड़ी चुनौती बनकर उभरा है, बल्कि यह प्रशासन और राजनीति के बीच गहरे रिश्तों को भी उजागर कर रहा है। आरोपियों पर कार्रवाई में हो रही देरी ने यह साबित कर दिया है कि कानून केवल आम जनता के…

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