एक लड़की थी जन्मीजो अपने पहचान में थी खोई।कभी पिता के नाम सेऔर फिर पति के नाम से पहचानी वो गई।

पहचान
एक लड़की थी जन्मी
जो अपने पहचान में थी खोई।
कभी पिता के नाम से
और फिर पति के नाम से पहचानी वो गई।
हमेशा से थी घुटती,
यह सोच कर कि
उसकी खुद की पहचान भी कही थी छिपी
जो चुपके से थी रोती।
उसकी चमकती आँखें में
था उम्मीद का उजाला ,
कभी मासुमियत, कभी एक
विशाल काया।
बुनती थी ख्वाब रंग-बिरंगे
और कहती थी वह हर बार
सबसे-“मैं हूं एक लड़की ,
पहचान मेरी हैं ,हर रंग में बसी,
ये दुनिया मेरी हैं।
वह थी किसी की बेटी ,
वह थी किसी की मां,
वह थी किसी की पत्नी ,
या थी किसी की राह।
पर सबसे पहले थी वो
लड़की जो खुद में थी खोई
और खुद को थी सुनाती की उसकी
पहचान कहा थी छिपी ।
इसी सोच में जी गई ,
जो तन्हाई बन उसे सताई।
अब आखिरी सांस लेते हुए
फिर से एक ही बात दोबारा दोहराई –
“मैं हूं एक लड़की , पहचान मेरी हैं ,
हर रंग में बसी , ये दुनिया मेरी है”।
फिर आँख बंद कर इसी ख्वाब में हमेशा के
लिए सो वो गई।
——श्रीजन श्रेया


