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कहां मैं भाव बेचने आया
कहां मैं भाव बेचने आया
लफ़्ज़ों के शहर में
कहां मैं भाव बेचने आया?
यहां लोग…
इस्तेमाल करते हैं
अपने स्वार्थ के लिए
किसी का दर्द, व्यथा,
हालात और दुःख…
कहां मैं ठूंठ-से शहर में
शीतल-छांव बेचने आया।
यहां लोग….
सिर्फ खेलते हैं अल्फाजों से,
बढ़ा चढ़ाकर कहते हैं…
अमीरों की गाथाएं,
स्टारों की जुबानी,
नेताजी के कारनामे,
कहां मैं नकाबपोश शहर में
मर्यादित दांव बेचने आया।
यहां लोग….
करते हैं तोहीन शब्दों की,
तोड़ मरोड़ कर फंसा देते हैं
बेतुकी बातें,
हरकतें तन-मन की,
बेमतलबी इरादे,
कहां मैं कीचड़-से शहर में
गंगा – बहाव बेचने आया।।
लफ़्ज़ों के शहर में ‘मुसाफिर’….
कहां मैं भाव बेचने आया।।
रोहताश वर्मा ‘मुसाफ़िर’
खरसंडी, नोहर, राजस्थान


