जानिए ब्रह्मांड के न्यायाधीश भगवान चित्रगुप्त कैसे हुआ अवतार – डॉ. बी. के. मल्लिक

जानिए ब्रह्मांड के न्यायाधीश भगवान चित्रगुप्त कैसे हुआ अवतार – डॉ. बी. के. मल्लिक
जब ब्रह्मा जी ने सृष्टि का निर्माण किया। उसके बाद लोगों से कर्मों का लेखा जोखा एवं प्राण लेने का काम सूर्यपुत्र यमदेव को दिया गया था। लोगों के पाप एवं पुण्य के अनुसार उसको फल देने का काम यमराज कर रहे थे। एकबार यमराज जी को मन में आया कि बिना आयु समाप्त किसी को प्राण लिया जा सकता है या नहीं। एक दिन वह मांडव ऋषि को देख उनको प्राण लेने का मन बनाया।
महर्षि माण्डव्य भार्गव वंश के ऋषि थे और उनका एक नाम “अणीमाण्डव्य” भी कहा गया है। इनके विषय में कथा मत्स्य पुराण में दी गयी है। वे महर्षि मातंग और दित्तामंगलिका के पुत्र थे। उन्होंने अल्प आयु में ही बहुत सी सिद्धियां प्राप्त कर ली और ऋषियों में सम्मानित हो गए। उनका एक व्रत था कि संध्याकाल के तप के समय वे मौनव्रत धारण किये रहते थे।
एक बार कुछ लुटेरे लूट का बहुत सारा सामान लेकर भाग रहे थे। उनके पीछे कई राजकीय सैनिक लगे थे जिनसे बचने के लिए वे भाग कर माण्डव्य ऋषि के आश्रम में छिप गए। थोड़ी देर बाद जब सैनिक वहां आये तो उन्होंने माण्डव्य ऋषि से उन लुटेरों के विषय में पूछा। मौन व्रत के कारण उन्होंने कुछ उत्तर नहीं दिया। तब जब सैनिक अंदर गए तो उन्हें लूट के सामान के साथ लुटेरे भी मिल गए। उन्होंने समझा कि ये ऋषि भी इनके साथ मिले हुए हैं इसी कारण वे लुटेरों के साथ ऋषि को भी पकड़ कर ले गए और राजा के सामने प्रस्तुत किया।

राजा ने भी उनसे प्रश्न किया किन्तु मौन व्रत होने के कारण माण्डव्य ऋषि कुछ नहीं बोले। राजा ने इसे उनकी स्वीकृति समझा और सभी लुटेरों के साथ उन्हें भी सूली पर चढाने का आदेश दे दिया। सूली पर चढाने से अन्य लुटेरे तो तक्षण मर गए किन्तु माण्डव्य ऋषि अपने तप के बल पर कई दिनों तक बिना खाये-पिए जीवित रहे। शूल के अग्र भाग को “अणि” कहते हैं और तभी से वे “अणीमाण्डव्य” नाम से भी प्रसिद्ध हुए।
जब राजा को इस चमत्कार के बारे में पता चला तो तो स्वयं नंगे पांव महर्षि के पास आये और उन्हें सूली पर से उतारा। फिर उन्होंने महर्षि से बारम्बार क्षमा मांगी। मांडव्य ऋषि ने ये सोच कर उसे क्षमा कर दिया कि राजा ने तो परिस्थिति के अनुसार न्याय किया। वे चुप-चाप वहां से चले गए। वे चले तो गए किन्तु एक बात उन्हें खाये जा रही थी कि उन्होंने कभी कोई पाप नहीं किया फिर किस कारण उन्हें ऐसा दंड भोगना पड़ा?
इसका कारण जानने के लिए वे यमपुरी पहुंचे जहाँ यमराज ने उनका स्वागत किया। माण्डव्य ऋषि ने यमराज से पूछा कि उन्हें याद नहीं कि कभी उन्होंने कोई अपराध किया हो तो फिर किस कारण उन्हें ऐसा घोर दंड भोगना पड़ा? इस पर यमराज ने कहा – “हे महर्षि! बालपन में आपने पतंगों के पृष्ठ भाग में सींक घुसा दिया था जिस कारण आपको ये दंड भोगना पड़ा। जिस प्रकार छोटे से पुण्य का भी बहुत फल प्राप्त होता है उसी प्रकार छोटे से पाप का भी फल अधिक ही मिलता है।
यह सुनकर माण्डव्य ऋषि ने यमराज से पूछा कि मैंने ये अपराध किस आयु में किया था? तब यमराज ने उन्हें बताया कि उन्होंने ये कार्य १२ वर्ष की आयु में किया था। इसपर माण्डव्य अत्यंत क्रोधित हो यमराज से बोले – “हे धर्मराज! शास्त्रों के अनुसार मनुष्य द्वारा १२ वर्ष तक किये कार्य को अपराध की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता क्यूंकि उस आयु में उन्हें पाप पुण्य का ज्ञान नहीं होता। किन्तु तुमने बालपन में किये गए मेरे अपराध के कारण मुझे इतना बड़ा दंड दिया इसीलिए मैं तुम्हे श्राप देता हूँ कि तुम मनुष्य योनि में शूद्र वर्ण में एक दासी के गर्भ से जन्मोगे।”
तब यमराज ने उनसे प्रार्थना की तो उन्होंने उन्हें बताया कि अगले जन्म में वे सारे संसार में प्रसिद्ध होंगे। उसके अतिरिक्त माण्डव्य ऋषि ने एक नयी मर्यादा स्थापित की जिसमें उन्होंने आयु सीमा को बढ़ा कर १४ वर्ष कर दिया। अब १४ वर्ष तक के बच्चों को अपने किये आचरण के कारण दंड से अभय मिल गया। माण्डव्य ऋषि के श्राप के कारण ही धर्मराज द्वापर में महर्षि वेदव्यास की कृपा से अम्बा की दासी पारिश्रमी के गर्भ से विदुर के रूप में जन्म हुआ जो बहुत ही ज्ञानी थे।
यमराज के इस काम से ब्रम्हा जी ने बहुत शर्मिंदगी महसूस किया और सोचा कि इस काम को किसको की दिया जाय। जब उनको सिखाई के लिए कोई सुयोग्य व्यक्ति नहीं मिला तो उन्होंने से 1000 वर्ष तक तपस्या किया। उसके बाद उनके काया से एक व्यक्ति व्यक्ति उत्पन्न हुआ जैसे हाथ में कलम दूसरे हाथ में दवा तीसरे हाथ में तलवार और चौथे हाथ में शंख था। ब्रम्हा जी ने उनका नाम चित्रगुप्त रखा। इस पुरुष का जन्म ब्रह्मा जी की काया से हुआ था। अत: ये कायस्थ कहलाये और इनका नाम चित्रगुप्त पड़ा। इसी तरह उनकी संतानों के जरिए जो वंश आगे बढ़ा और जो जाति बनी वह कायस्थ कहलाए। जिस जगह वे अवतरित हुए वह मध्य प्रदेश के उज्जैन के कायथा ग्राम में हुआ था। इसलिए कुछ लोग इसलिए कायस्थ को कैथ भी कहते है । कायस्थ के लिखावट को कैथी लिपि कहते है जिसका कार्य अभी भी निबंधन/रजिस्ट्री ऑफिस या पुराने कागजात में प्रयोग किया गया।
भगवान चित्रगुप्त जी के हाथों में कर्म की किताब, कलम, दवात और करवाल है। ये कुशल लेखक हैं और इनकी लेखनी से जीवों को उनके कर्मों के अनुसार न्याय मिलती है। कार्तिक शुक्ल द्वितीया तिथि को भगवान चित्रगुप्त की पूजा का विधान है। इस दिन भगवान चित्रगुप्त और यमराज की मूर्ति स्थापित करके अथवा उनकी तस्वीर रखकर श्रद्धा पूर्वक सभी प्रकार से फूल, अक्षत, कुमकुम, सिन्दूर एवं भांति भांति के पकवान, मिष्टान एवं नैवेद्य सहित इनकी पूजा करें और फिर जाने अनजाने हुए अपराधों के लिए इनसे क्षमा याचना करें। यमराज और चित्रगुप्त की पूजा एवं उनसे अपने बुरे कर्मों के लिए क्षमा मांगने से नरक का फल भोगना नहीं पड़ता है।
चित्रगुप्त पूजा का त्योहार कायस्थ समाज में अधिक प्रचलित है। क्योंकि चित्रगुप्त जी को वह अपना कुल देवता मनाते हैं। दरअसल भगवान चित्रगुप्त का जन्म ब्रह्मा के अंश से हुआ है। जो जीव जगत में मौजूद सभी का लेखा-जोखा रखते है।
चित्रगुप्त एक हिंदू देवता हैं जिन्हें पृथ्वी पर मनुष्यों के कार्यों का पूरा रिकॉर्ड रखने और उन्हें उनके कर्मों के अनुसार दंडित या पुरस्कृत करने का कार्य सौंपा गया है।
सभी प्राणियों को उनकी मृत्यु के बाद चित्रगुप्त को पृथ्वी पर उनके कार्यों के आधार पर मनुष्यों के लिए स्वर्ग या नरक का निर्णय करने का कार्य सौंपा गया है।
चित्रगुप्त भगवान ब्रह्मा के सत्रहवें मानसपुत्र हैं। माना जाता है कि चित्रगुप्त को ब्रह्मा की आत्मा और मन से बनाया गया था और इस प्रकार, उन्हें क्षत्रिय के कर्तव्य के साथ ब्राह्मणों की तरह वेद लिखने का अधिकार दिया गया, वह मृत्यु के देवता यमराज के साथ जाते हैं।


