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मैं गर्मी में भी ओढ़ता हूँ कपड़े भारी,न सूरज से डर, न धूप की मार ज़ारी।हर परत में छुपा है कोई राज़ पुराना,हर सिलाई में दबा एक ज़ख्म का अफ़साना।

चेहरे के पीछे”
मैं गर्मी में भी ओढ़ता हूँ कपड़े भारी,
न सूरज से डर, न धूप की मार ज़ारी।
हर परत में छुपा है कोई राज़ पुराना,
हर सिलाई में दबा एक ज़ख्म का अफ़साना।
ये निशान नहीं हैं दिखाने के लिए,
न ही सवालों की भीड़ में बताने के लिए।
कभी जब सच्चाई झाँकती है चुपचाप,
तो समाज हटा लेता है अपनी झूठी आप।
जो कहते हैं — “मजबूत बनो”,
वही पहले चोट पर हँसी बनो।
जो टूटे हैं अंदर से,
उन्हें अक्सर कहा जाता है — “कमज़ोर से।”
तो मैं छुपाता हूँ वो हर दर्द,
जिसे सुनने की किसी में न हो ज़रूरत या फ़ुर्सत।
पर इन ज़ख्मों में है एक कहानी,
हार नहीं, बस चुप्पी की रवानी।
क्योंकि समाज चेहरे पढ़ता है, आत्मा नहीं,
जो दिखे वही सच — बाकी सब गिनती में नहीं।
तो मैं मुस्कान पहन कर चलता हूँ,
और हर चीख़ को चुपचाप निगलता हूँ।
- श्रीजन श्रिया


