
जाति के जंजाल में उलझे बिहार में जीत का X फैक्टर बनी महिला वोटर” – सतीश के दास

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 कई मायनों में ऐतिहासिक साबित हुआ है। इस बार परिणामों से पहले ही एक संकेत पूरे राज्य में स्पष्ट दिखाई दे रहा था—*आधी आबादी यानी महिला वोटर ही इस चुनाव की असली निर्णायक शक्ति होंगी।* जिस व्यापक और अभूतपूर्व भागीदारी के साथ महिलाओं ने मतदान केंद्रों पर उपस्थिति दर्ज कराई, उसने यह साफ कर दिया कि बिहार की राजनीति की नई दिशा अब महिला मतदाताओं की इच्छा और अपेक्षाओं से ही तय होगी।
इस चुनाव में रिकॉर्ड तोड़ मतदान हुआ, विशेषकर महिला वोटरों का उत्साह पिछले सभी चुनावों से अधिक दिखाई दिया। सुबह से शाम तक हर बूथ पर महिलाओं की लंबी कतारें परंपरागत जातीय गणित को झकझोरने वाली तस्वीर पेश कर रही थीं। विशेषज्ञों के मुताबिक, इस बार के चुनाव में पुरुषों की तुलना में महिलाओं की मतदान दर अधिक रही, जो अपने आप में राजनीतिक परिदृश्य के बदलते स्वरूप का संकेत है।
*प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की लोकप्रिय जोड़ी* ने भी इस उत्साह को नई दिशा दी। मोदी के विकास-आधारित नेतृत्व और नीतीश कुमार के महिला-केंद्रित जनकल्याण मॉडल ने मिलकर ऐसा भरोसा पैदा किया कि महिला मतदाता एक मजबूत, सुरक्षित और स्थिर सरकार के पक्ष में एकजुट होती दिखाई दीं।
नीतीश कुमार की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत हमेशा से महिलाएँ रही हैं। शराबबंदी, साइकिल योजना, पोशाक योजना, जीविका समूह, विद्यालय से लेकर पंचायत तक महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने वाले उनके कदमों ने आधी आबादी में गहरा विश्वास पैदा किया है। यही कारण है कि पिछले चार विधानसभा चुनाव—2010, 2015, 2020 और अब 2025—किसी भी वर्ष, किसी भी परिस्थिति में नीतीश कुमार के पक्ष में महिला वोटरों का रुझान निर्णायक ही रहा है।
*महिला मतदाताओं का यह विश्वास जाति-आधारित राजनीति के ढांचे को चुनौती दे रहा है।*
जहाँ बिहार दशकों तक जातीय समीकरणों के आधार पर चुनावी नतीजे तय करता रहा है, वहीं अब तस्वीर बदल रही है। महिला वोटर न केवल विकास, सुरक्षा और शिक्षा जैसे मुद्दों पर अपना रुख स्पष्ट कर रही हैं, बल्कि राजनीतिक दलों को यह संदेश भी दे रही हैं कि जाति आधारित प्रचार अब प्रभावी नहीं रहेगा।
चुनाव परिणामों ने इस तथ्य को मजबूत कर दिया है कि आने वाले वर्षों में बिहार में महिलाओं और युवाओं की राजनीतिक भूमिका और अधिक मजबूत होगी। विशेष रूप से महिलाएँ, जो पहले केवल मतदाता थीं, अब राजनीतिक शक्ति केंद्र बन रही हैं। आने वाले समय में बिहार में *मजबूत महिला राजनीतिक चेहरे* उभरने की पूरी संभावना है।
यह बदलाव केवल बिहार तक सीमित नहीं रह सकता। राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि जैसे-जैसे महिला वोटर की निर्णायक भूमिका स्पष्ट होगी, राष्ट्रीय स्तर पर भी दल बिहार मॉडल को अपनाकर महिला नेतृत्व को बढ़ावा देने की कोशिश करेंगे। दलों के लिए आधी आबादी को सीधे जोड़ना, जातिगत गणित का विकल्प तैयार करने की प्रभावी रणनीति साबित हो सकता है।
अंततः, 2025 का चुनाव यह संदेश साफ छोड़ गया है—
*बिहार की राजनीति में जाति का जंजाल जितना कमजोर होगा, महिला वोटर की ताकत उतनी ही मजबूत होगी।*
और यही बदलता बिहार है।



