बिहार एवं झारखंड

*रेरा में ब्याज, मुआवज़ा और रिफंड की वास्तविक समझ*

*रेरा में ब्याज, मुआवज़ा और रिफंड की वास्तविक समझ*

*रेरा (RERA) कानून की साप्ताहिक विशेष श्रृंखला*

*रेरा दृष्टि अष्टम किस्त*

*रेरा में ब्याज, मुआवज़ा और रिफंड की वास्तविक समझ*

नमस्कार दोस्तों,
पिछली किस्त में हमने FAQ के माध्यम से यह स्पष्ट करने का प्रयास किया था कि रेरा कानून धाराओं की किताब नहीं, बल्कि आम खरीदार का भरोसेमंद साथी है। आज हम उस सवाल पर आते हैं जो हर उस परिवार के मन में गूंजता है, जिसने कभी घर बुक किया है— “अगर बिल्डर समय पर घर नहीं देता, तो हमारा नुकसान कौन पूरा करेगा?” “क्या सिर्फ इंतज़ार करना ही हमारी नियति है?” रेरा कानून का उत्तर स्पष्ट, व्यावहारिक और न्यायपूर्ण है— नुकसान का हिसाब होगा। और वह हिसाब कानून तय करेगा।

*ज़िंदगी के छोटे उदाहरण से बड़ी बात*
रोज़मर्रा की ज़िंदगी में हम समय की क़ीमत अच्छी तरह समझते हैं।
आपने किसी टेलर को शादी का सूट सिलने के लिए दिया। तारीख तय थी—शादी से एक हफ्ता पहले। अब अगर सूट शादी के बाद मिले, तो क्या सिर्फ़ “सॉरी” काफ़ी है? नहीं। या तो टेलर पैसा लौटाएगा, या आपको किसी और से महँगा सूट बनवाना पड़ेगा—जिसका हर्जाना वह देगा।
अगर आप किसी टैक्सी को सुबह 9 बजे के लिए बुक करें और वह दोपहर 12 बजे आए, तो क्या आप पूरा किराया देंगे? या अगर बैंक आपकी जमा राशि लौटाने में देरी करे, तो क्या वह बिना ब्याज के काम चला सकता है? नहीं।
तो फिर सवाल उठता है— जब खरीदार समय पर भुगतान करता है और बिल्डर समय पर घर नहीं देता, तो क्या देरी की क़ीमत सिर्फ खरीदार ही चुकाए? रेरा ने इसी असंतुलन को ठीक करने के लिए स्पष्ट नियम बनाए।

*रेरा की धारा 18 – खरीदार की आर्थिक सुरक्षा का आधार*

रेरा कानून की धारा 18 खरीदार को यह भरोसा देती है कि यदि तय समय पर पज़ेशन नहीं मिला, तो खरीदार को मजबूर नहीं किया जा सकता। यह धारा खरीदार को दो स्पष्ट रास्ते देती है— रास्ते जो परिस्थितियों और ज़रूरतों के अनुसार चुने जा सकते हैं।
*पहला रास्ता*: अब इंतज़ार नहीं, पैसा वापस चाहिए
मान लीजिए किसी परिवार ने यह सोचकर फ्लैट बुक किया कि बच्चों का स्कूल पास होगा, ऑफिस की दूरी कम होगी और किराए से मुक्ति मिलेगी। लेकिन तीन-चार साल बीत जाते हैं। बच्चे कॉलेज पहुँच जाते हैं, नौकरी बदल जाती है, और ज़िंदगी की ज़रूरतें बदल जाती हैं। रेरा ऐसे खरीदार से यह नहीं कहता कि अब आपने बुक कर लिया है, तो फँसे रहिए।” कानून साफ़ कहता है— आप प्रोजेक्ट से बाहर निकल सकते हैं। पूरी जमा राशि ब्याज सहित वापस ली जा सकती है। यह निर्णय खरीदार का होता है, बिल्डर का नहीं।

*दूसरा रास्ता*: घर चाहिए, लेकिन देरी का हिसाब चाहिए
अब एक दूसरा दृश्य सोचिए। खरीदार किराए के मकान में रह रहा है। EMI भी चल रही है, किराया भी। हर छह महीने में बिल्डर का जवाब वही “सर, बस थोड़ा सा काम बाकी है।”रेरा मानता है कि खरीदार का पैसा समय पर लिया गया है, इसलिए समय की क़ीमत भी चुकानी होगी । ऐसे मामलों में पज़ेशन मिलने तक ब्याज देना बिल्डर की कानूनी ज़िम्मेदारी है।
ब्याज की दर – मनमानी नहीं, नियम से तय
एक आम धारणा है कि ब्याज बिल्डर की मर्ज़ी से तय होता है। रेरा ने इस भ्रम को भी तोड़ा। अधिकांश राज्यों में ब्याज की गणना इस आधार पर होती है— SBI की MCLR + राज्य द्वारा अधिसूचित प्रतिशत । इसका उद्देश्य है— खरीदार को उचित मुआवज़ा और बिल्डर पर अनुचित बोझ नहीं ।

*एक बिल्कुल ज़मीनी और समझने योग्य उदाहरण*

मान लीजिए— कुल भुगतान: ₹45 लाख, पज़ेशन की तय तारीख: जुलाई 2020, वास्तविक पज़ेशन: जुलाई 2023, कुल देरी: 3 साल , ब्याज दर (मान लें): 9% वार्षिक ।
*सरल गणना*
₹45,00,000 × 9% × 3 = ₹12,15,000
यह राशि किसी दंड की तरह नहीं, बल्कि उस समय की भरपाई है, जो खरीदार ने किराए, EMI और मानसिक तनाव में गंवाया।
मुआवज़ा कब अलग से मिलता है?
यह समझना भी ज़रूरी है कि हर मामले में “अलग से मुआवज़ा” नहीं दिया जाता। मुआवज़ा तब दिया जाता है जब जानबूझकर गलत जानकारी दी गई हो, बार-बार झूठे वादे किए गए हों, खरीदार को गुमराह कर निर्णय करवाया गया हो, या मानसिक उत्पीड़न स्पष्ट हो । रेरा ऐसे मामलों में परिस्थितियों को देखकर अतिरिक्त राहत देता है।
*एग्रीमेंट बनाम कानून – कौन ऊपर?* अक्सर बिल्डर यह तर्क देते हैं— “एग्रीमेंट में ब्याज कम लिखा है।”रेरा का दृष्टिकोण स्पष्ट है, अगर एग्रीमेंट की शर्तें एकतरफा, अनुचित या खरीदार के विरुद्ध हैं, तो कानून उन शर्तों से ऊपर होता है। रेरा भावनाओं से नहीं, तथ्यों से चलता है । रेरा यह नहीं पूछता कि खरीदार कितना परेशान है। वह पूछता है , भुगतान कब किया गया, पज़ेशन कब मिलना था, कितनी देरी हुई और फिर ठोस गणना के आधार पर आदेश देता है।

*रेरा का खरीदार को संदेश*

रेरा यह नहीं कहता कि हर देरी पर टकराव ज़रूरी है। लेकिन यह ज़रूर कहता है— अगर समय लिया गया है, तो समय की भरपाई भी होगी। रेरा में ब्याज, मुआवज़ा और रिफंड सिर्फ़ आँकड़े नहीं हैं। ये उस भरोसे की क़ीमत हैं जो एक आम परिवार बिल्डर पर करता है। घर खरीदना सपना है और अगर उस सपने में देर होती है, तो उसका हिसाब भी तय है।

इस साप्ताहिक श्रृंखला की अष्टम किस्त यहीं समाप्त होती है। अगली किस्त में हम जानेंगे रेरा के महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसले, जहाँ खरीदारों को यह सब सिर्फ लिखा हुआ नहीं, बल्कि ज़मीन पर मिलता हुआ दिखाई दिया।

धन्यवाद।

आपका साथी,
*Vishamber Shokeen*
*(विशम्बर शौकीन)*
*कंपनी सचिव एवं रेरा सलाहकार*

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