
“मौन की महिमा : जहाँ शब्द थम जाते हैं और आत्मा बोल उठती है।”
“मौन की महिमा : जहाँ शब्द थम जाते हैं और आत्मा बोल उठती है।”
समाज चिंतन – भाग 9
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“मौन की महिमा : जहाँ शब्द थम जाते हैं और आत्मा बोल उठती है।”
__ राजेश निगम
हम एक ऐसे युग में जी रहे हैं जहाँ शब्दों का शोर बहुत है, पर अर्थ की गूंज कम।
जहाँ बोलने की होड़ है, पर सुनने की साधना दुर्लभ। ऐसे समय में मौन केवल चुप रहना नहीं है, मौन वह आंतरिक शक्ति है जो हमें स्वयं से मिलाती है।
मौन वह क्षण है जहाँ विचार शांत होकर
सत्य प्रकट करते हैं।
जहाँ बाहरी हलचल मिटती है और भीतर का प्रकाश दिखाई देता है।
शब्द अक्सर भ्रम पैदा करते हैं, पर मौन कभी झूठ नहीं बोलता।
मौन वह दर्पण है
जिसमें आत्मा अपना वास्तविक स्वरूप देखती है।
जो व्यक्ति मौन को समझ लेता है, वह संबंधों की भाषा भी समझ लेता है, दर्द की ध्वनि भी, और प्रेम का स्पर्श भी।
मौन हमें संयम सिखाता है, कब बोलना है,
कब रुकना है, और कब सिर्फ सुनना है।
क्योंकि हर उत्तर शब्दों में नहीं होता, कई उत्तर मन की शांत सतह पर उभरते हैं।
जब हम भीतर के मौन को अपनाते हैं, तब बाहरी कोलाहल हमें विचलित नहीं करता।
तब अपमान से चोट नहीं लगती, तब प्रशंसा अहंकार नहीं बनती।
मौन मन को संतुलन देता है, एक ऐसी ऊर्जा
जो पर्वतों की तरह स्थिर
और नदी की तरह सरल होती है।
मौन कोई खालीपन नहीं, यह तो ऊर्जा का महासागर है। जहाँ ध्यान जन्म लेता है, जहाँ ज्ञान परिपक्व होता है।
जहाँ मनुष्य अपनी आत्मा का संगीत सुन पाता है।
याद रखिए :
मौन कमजोरी नहीं,
सबसे ऊँची शक्ति है।
क्योंकि मौन में ही
भगवान की सबसे गहरी आवाज़ सुनाई देती है।
अगले भाग में पढ़िए :
“संपर्क का विज्ञान : जहाँ भावनाएँ रास्ता बनाती हैं और रिश्ते सेतु बन जाते हैं।”
—राजेश निगम, इंदौर
(मध्य प्रदेश, प्रदेश अध्यक्ष)
भारतीय पत्रकार सुरक्षा परिषद



