
आज का विचार : उम्मीद कम रखिए, खुशी ज़्यादा होगी
आज का विचार : उम्मीद कम रखिए, खुशी ज़्यादा होगी
आज का विचार : उम्मीद कम रखिए, खुशी ज़्यादा होगी

आज का युवा सपनों के साथ जी रहा है—बड़े सपने, तेज़ सफलता और तुरंत पहचान के सपने। वह मेहनत करता है, संघर्ष करता है और आगे बढ़ना चाहता है। लेकिन इसी दौड़ में वह एक अनदेखा बोझ अपने मन पर ढोने लगता है—अत्यधिक उम्मीदों का बोझ। यही बोझ धीरे-धीरे उसकी खुशी, शांति और आत्मविश्वास को कम करता चला जाता है।
पढ़ाई में अव्वल आना, करियर में तुरंत ऊँचाई पाना, रिश्तों में पूर्णता, समाज में स्वीकार्यता—हर मोर्चे पर अपेक्षाएँ ही अपेक्षाएँ। जब परिणाम इन उम्मीदों से मेल नहीं खाते, तो युवा खुद से प्रश्न करने लगता है— “क्या मैं पर्याप्त नहीं हूँ?” यही प्रश्न मानसिक तनाव, चिंता और अवसाद की जड़ बन जाता है।
आध्यात्मिक दृष्टि हमें बताती है कि जीवन की सबसे बड़ी भूल यही है कि हम परिणामों को अपनी खुशी से जोड़ लेते हैं। श्रीमद्भगवद्गीता का शाश्वत संदेश है— “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।”अर्थात मनुष्य का अधिकार केवल कर्म पर है, फल पर नहीं। यह श्लोक युवाओं के लिए केवल धार्मिक उपदेश नहीं, बल्कि एक मानसिक स्वास्थ्य सूत्र है। जब युवा पूरी निष्ठा से प्रयास करता है और परिणाम को स्वीकार करने की क्षमता विकसित करता है, तब उसका मन अस्थिर नहीं होता। उम्मीदें कम रखने का अर्थ यह नहीं कि महत्वाकांक्षाएँ छोड़ दी जाएँ। इसका अर्थ है—उम्मीद और आसक्ति में अंतर समझना। उपनिषद कहते हैं— “यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिताः।”जब मन में जमी हुई अत्यधिक कामनाएँ और अपेक्षाएँ ढीली पड़ती हैं, तभी मन हल्का होता है। हल्का मन ही रचनात्मक होता है, स्थिर होता है और आत्मविश्वास से भरा होता है।
आज सोशल मीडिया ने युवाओं की मानसिक स्थिति को और जटिल बना दिया है। दूसरों की सफलता की चमकदार तस्वीरें देखकर अपनी वास्तविक ज़िंदगी को कमतर आँकना आम हो गया है। तुलना से उम्मीदें बढ़ती हैं और उम्मीदों के साथ बढ़ता है मानसिक दबाव। भगवान बुद्ध का संदेश यहाँ मार्गदर्शक है— “अप्प दीपो भव। स्वयं अपना प्रकाश बनो। दूसरों की यात्रा देखकर नहीं, अपनी यात्रा को स्वीकार करके ही मानसिक शांति संभव है। आध्यात्मिक ग्रंथ यह भी बताते हैं कि संतोष के बिना कोई भी उपलब्धि सुख नहीं दे सकती। महाभारत में स्पष्ट कहा गया है— “सन्तोषः परमं सुखम्।”जब युवा छोटी उपलब्धियों में भी संतोष ढूँढना सीख लेता है, तब उसका मन निरंतर शिकायत की अवस्था से बाहर आता है। संतोष आत्म-स्वीकृति लाता है, और आत्म-स्वीकृति मानसिक स्वास्थ्य की नींव है। मानसिक स्वास्थ्य के संदर्भ में यह समझना अत्यंत आवश्यक है कि अत्यधिक उम्मीदें स्वयं के प्रति कठोरता पैदा करती हैं। इसके विपरीत, सीमित उम्मीदें आत्म-दया, धैर्य और संतुलन सिखाती हैं। योग, ध्यान, आत्मचिंतन और आभार भाव जैसे आध्यात्मिक अभ्यास युवाओं के लिए केवल साधना नहीं, बल्कि मानसिक स्वच्छता के साधन हैं।
आज का युवा और प्रोफेशनल—दोनों ही लक्ष्य, डेडलाइन और अपेक्षाओं के दबाव में निरंतर आगे बढ़ रहे हैं। इस दौड़ में सफलता आवश्यक है, लेकिन उससे भी अधिक आवश्यक है मानसिक संतुलन और आत्म-शांति। मेरी यही सलाह है कि अपने कार्य के प्रति पूर्ण निष्ठा रखें, परंतु परिणाम को अपनी आत्म-प्रतिष्ठा और खुशी का एकमात्र आधार न बनाएं। कैरियर में प्रगति, पद, पैकेज या पहचान—ये सभी महत्वपूर्ण हैं, पर ये जीवन का पूर्ण सत्य नहीं हैं। स्वयं को केवल उपलब्धियों से न आँकें। हर दिन यह देखें कि आपने अपने दायित्व ईमानदारी से निभाए या नहीं। यदि उत्तर सकारात्मक है, तो स्वयं को संतोष देने में संकोच न करें। तुलना से दूरी रखें, निरंतर सीखते रहें और असफलताओं को अनुभव समझें, न कि अस्वीकृति। सीमित अपेक्षाएँ आपको अधिक स्पष्ट सोच, बेहतर निर्णय और स्वस्थ रिश्ते प्रदान करती हैं। याद रखिए—स्थायी सफलता वही है जो मानसिक शांति के साथ आए।
लेखक:
विशम्बर शौकीन
कंपनी सचिव एवं रेरा *सलाहकार



