
संस्कारों से व्यक्तित्व-निर्माण

संस्कार किसी भी मनुष्य की वास्तविक पहचान होते हैं। व्यक्ति के शब्दों, व्यवहार, निर्णयों और जीवन-दृष्टि में जो सौम्यता, अनुशासन, करुणा, सत्यनिष्ठा और विनम्रता दिखाई देती है, वह उसके संस्कारों की ही छाप होती है। जन्म से कोई महान नहीं बनता—महानता के बीज तो परिवार, समाज और संस्कृति से प्राप्त संस्कारों द्वारा ही अंकुरित होते हैं।
1. संस्कार—व्यक्तित्व का आधार
व्यक्तित्व केवल बाहरी रूप, पहनावा या बोलचाल से नहीं बनता; यह मन के भीतर संस्कारित मूल्यों का प्रतिबिंब होता है। जैसे—ईमानदारी, मेहनत, संवेदनशीलता, कर्तव्यनिष्ठा, समयपालन, धैर्य—ये सारे गुण व्यक्तित्व को ऊँचा उठाते हैं। और ये गुण केवल सिखाए नहीं जाते, बल्कि व्यवहार और आदतों के माध्यम से जीवन में उतारे जाते हैं।
2. बाल्यावस्था—संस्कारों का सर्वोत्तम समय
जिस प्रकार मिट्टी को प्रारम्भ में ही सही आकार दिया जा सकता है, उसी प्रकार बचपन ही संस्कारों की नींव का समय होता है।
माता-पिता का आचरण ही बच्चे का पहला पाठ होता है।
घर में बोली जाने वाली भाषा, व्यवहार की सौम्यता, बुजुर्गों के प्रति सम्मान—ये सब बच्चा स्वभावतः आत्मसात कर लेता है।
इसलिए कहा गया है—“बालक अनुकरण से सीखता है, उपदेश से नहीं।”
3. शिक्षा और संस्कार—दोनों का संगम
शिक्षा बिना संस्कार के अधूरी है, और संस्कार बिना शिक्षा के असंतुलित।
पुस्तकें ज्ञान देती हैं, पर संस्कार उस ज्ञान के सही उपयोग का विवेक भी देते हैं।
इसी कारण भारतीय शिक्षा-परंपरा में “विद्या” और “विवेक” दोनों को समान महत्व दिया गया है।
4. संस्कार से बनता है चरित्र
चरित्र व्यक्ति की सबसे बड़ी पूंजी है। चरित्र की मजबूती वही है जो विपरीत परिस्थितियों में भी सत्य, धर्म और मानवता का साथ न छोड़े। संस्कार व्यक्ति को यही सामर्थ्य देते हैं—
कठिन समय में भी सकारात्मक रहना
क्रोध में भी संयम बनाए रखना
सफलता में भी विनम्र रहना
धन-संपत्ति पाकर भी अहंकार से दूर रहना
यही चरित्र मनुष्य को सम्मानयोग्य बनाता है और यही उसके व्यक्तित्व की पहचान बनता है।
5. समाज में श्रेष्ठ व्यक्तित्व
संस्कारयुक्त व्यक्ति समाज में विश्वास और सौहार्द का आधार बनता है।
उसके भीतर सही-गलत का स्पष्ट बोध होता है, इसलिए वह समाज को सही दिशा देने वाला मार्गदर्शक भी बनता है।
ऐसे व्यक्तित्व से प्रभावित होकर अनेक लोग अच्छे कार्यों की ओर प्रेरित होते हैं—यही संस्कारित व्यक्ति की सबसे बड़ी विजय है।
6. आधुनिक समय में संस्कारों की आवश्यकता
तेज़ी से बदलते युग में जब तनाव, प्रतिस्पर्धा और भौतिकवाद बढ़ रहा है, तब संस्कार मन को स्थिर रखते हैं।
संस्कार हमें संयमित जीवन जीना सिखाते हैं,
रिश्तों में मधुरता बनाए रखते हैं,
जीवन को मूल्य-आधारित बनाते हैं।
आज तकनीक के साथ-साथ संवेदनशीलता और नैतिकता की भी उतनी ही आवश्यकता है, और यह संस्कारों से ही आती है।
समापन
संस्कार व्यक्तित्व का बाहरी नहीं, भीतर का सौंदर्य हैं। वे मनुष्य को केवल सफल नहीं बनाते, बल्कि श्रेष्ठ, संवेदनशील और आदर्श नागरिक बनाते हैं।
इसलिए कहा गया है—
“धन खो जाए तो कुछ खोता है, स्वास्थ्य खो जाए तो बहुत खोता है, पर संस्कार खो जाएँ तो सब कुछ खो जाता है।”
अनिल माथुर
ज्वाला-विहार, जोधपुर।



