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आशीर्वाद रंगमंडल की नवीनतम नाट्य प्रस्तुति पश्मीना दिवंगत ज्योत्सना वर्मा को किया समर्पित।

आशीर्वाद रंगमंडल की नवीनतम नाट्य प्रस्तुति पश्मीना दिवंगत ज्योत्सना वर्मा को किया समर्पित।

अशोक पासवान ब्यूरो आपकी आवाज।

बेगूसराय के दिनकर कला भवन बेगूसराय में रविवार की शाम आशीर्वाद रंगमंडल बेगूसराय की नवीनतम प्रस्तुति मृणाल माथुर लिखित और डॉ अमित रौशन द्वारा निर्देशित नाटक पश्मीना का सफल मंचन किया गया। नाट्य प्रस्तुति का उद्घाटन गंगा समग्र के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमरेंद कुमार सिंह उर्फ लल्लू बाबू, बेगूसराय नगर निगम की महापौर पिंकी देवी, पूर्व महापौर संजय कुमार, उप महापौर अनिता राय, वार्ड पार्षद डॉ शगुफ्ता ताजवर, सदर अनुमंडल पदाधिकारी राजीव कुमार, वरिष्ठ रंग निर्देशक अवधेश सिंह, वरिष्ठ चित्रकार सीताराम , कला संस्कृति पदाधिकारी श्याम साहनी, वरीय शिक्षक रंजन कुमार, रंगमंडल अध्यक्ष ललन प्रसाद सिंह और सचिव डॉ अमित रौशन ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्ज्वलित कर किया। सभी आगत अतिथियों का स्वागत ललन प्रसाद सिंह और डॉ अमित रौशन ने चादर ओढ़ा कर किया। नाट्य प्रस्तुति रंगकर्मी मोहित मोहन की दिवंगत माता ज्योत्सना वर्मा को समर्पित किया गया। सभी अतिथियों ने उनके तस्वीर पर पुष्प चढ़ा कर श्रद्धांजलि अर्पित की।

नाटक लोगों की खत्म हो गई संवेदना से शुरू हुआ, एक इमेज के माध्यम से, गोली चलती है और एक मौत होती है तो आम जन जीवन में लोगों को अब फर्क नहीं पड़ता है, एक लाश से कोई सेल्फी ले रहा है,कोई इग्नोर कर रहा है, कोई लाश की जेब से पर्स निकाल ले जाता है, इन्हीं घटनाओं से शुरू होता है।
अमर सक्सेना और विभा सक्सेना एक मध्यम वर्ग से आते हैं। उनका बेटा आर्मी में था जो आतंकवादी हमला में मारा जाता है। वो मां के लिए पश्मीना शॉल लाने वाला था, वही पश्मीना खून रोकने में उसके साथी जवान उपयोग करते हैं, घर आता है खून से लथपथ पश्मीना, जो अमर अपने पत्नी को नहीं दिखाते हैं, दूसरे तरफ बूढ़ा मुस्लिम दुकानदार जो पश्मीना बेचता है उसका बेटा आर्मी हमले में मारा जाता है, वो दुकानदार आर्मी अतुल सक्सेना को जनता था। पश्मीना खरीदने के दौरान पता चलता है कि वो दोनों शहीद अतुल के मां बाप हैं।
पूरी कहानी दोनों परिवार के मा बाप के दर्द के इर्द-गिर्द घूम कर ये साबित करता है कि मौत कहीं भी हो, किसी का भी हो दर्द एक समान ही होता है, हिन्दू हो या मुस्लिम।
इन दोनों के बीच रविन्द्र ढिल्लो और स्वीटी कश्मीर व्यापार करने जाता है, सौदा करता है, उसके लिए किसी की संवेदना कोई मायने नहीं रखता है। निर्देशक ने काफी करीब से अपने अभिनेता के माध्यम से मानवीय दर्द को दिखाया है। अंत में बूढ़ा दुकानदार का बेटा अपने पिता का विरोध करता है कि आपने ओरिजनल पश्मीना दस हजार में क्यों बेच दिया वो भी आदिल के कातिलों को…तो बूढ़ा मुस्लिम दुकानदार कहता है कि वो कातिल नहीं थे बेटा। वो हमारी तरह मां बाप थे, जो यहां कुछ ढूंढने आए थे, जो उनको कभी नहीं मिल सकता है। उनकी जुस्तजू उन्हें यहां ले आई। इसलिए एक पश्मीना कर्ज था, जो आज पंद्रह साल बाद मैंने उन्हें वापस किया है। इस पूरे नाटक में बाजारवाद को रविन्द्र ढिल्लो और स्वीटी के माध्यम से दिखाए गया है, जो घूमने और व्यापार ही सब जगह देखता है। नाटक में अमर सक्सेना की भूमिका सचिन कुमार,विभा सक्सेना की भूमिका कविता कुमारी, रविन्द्र ढिल्लो की भूमिका कुणाल भारती, स्वीटी की भूमिका रितु कुमारी,डॉ अमित कॉल की भूमिका सचिन कुमार द्वितीय, बूढ़ा दुकानदार की भूमिका अरुण कुमार, दुकानदार का बेटा , आर्मी, और फोटोग्राफर की भूमिका शुभम कुमार ने अपने बेहतरीन अभिनय से दर्शकों को भाव विह्वल कर दिया। रबिंद्र की भूमिका में कुणाल भारती और स्वीटी की भूमिका में रितु कुमारी के अभिनय और एक्सप्रेशन ने दर्शकों को काफी प्रभावित किया। दुकानदार की भूमिका में अरुण ने अपने अभिनय से एक पिता के दर्द का अहसास दर्शकों को रुला दिया। वेटर की भूमिका बिट्टू कुमार ने बखूबी निभाई। नेपथ्य में सेट डिजाइन सीताराम जी, संगीत अमन शर्मा, लाइट वरुण कर (कोलकाता ),सहयोग मकसूदन कुमार, धर्मेंद्र कुमार वस्त्र विन्यास मोहित मोहन, ऋतु कुमारी, सेट निर्माण विजय शर्मा, प्रॉपर्टी कुणाल भारती, सचिन कुमार, मोहित कुमार और पब्लिसिटी, बैनर, आमंत्रण सीताराम जी, विशेष सहयोग पंकज कुमार सिंहा, कैमरा अंकित कुमार, प्रस्तुति परिकल्पना एवं निर्देशन डॉ अमित रौशन का था। कार्यक्रम का संचालन दीपक कुमार ने किया। प्रस्तुति सहयोग में डॉ राज रौशन, विष्णु कुमार महत्वपूर्ण भूमिका अदा की।

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