
कर्म, आत्मा और चित्रगुप्त के आंकलन कावेद आशीष श्रीवास्तव राष्ट्रीय युवा अध्यक्ष, अखिल भारतीय कायस्थ महासभा गूढ़ रहस्य
अध्यक्ष, अखिल भारतीय कायस्थ महासभा गूढ़ रहस्य
कर्म, आत्मा और चित्रगुप्त के आंकलन का गूढ़ रहस्य

_भाग्य की रेखाएँ और कर्म का पुनर्लेखन_
वेद आशीष श्रीवास्तव
राष्ट्रीय युवा अध्यक्ष, अखिल भारतीय कायस्थ महासभा
सृष्टि का यह गूढ़ नियम है कि जीव के इस धाराधाम पर अवतरित होने से पूर्व ही उसकी नियति का एक सूक्ष्म प्रारूप रच दिया जाता है। जिस क्षण कोई आत्मा नवजात देह को धारण करती है, उस समय आकाशगंगा में ग्रहों और नक्षत्रों की जो विशेष स्थिति होती है, वही उसके प्रारब्ध और भाग्य की रेखाओं का निर्धारण करती है। यह प्रारब्ध मानो वह कोरा पृष्ठ है जिस पर विधाता की अदृश्य कलम द्वारा जीवन की मूलभूत संभावनाओं का आलेख अंकित कर दिया जाता है।
किंतु, मनुष्य का जीवन केवल प्रारब्ध की कठपुतली बनकर बह जाने का नाम नहीं है। विधाता ने जहाँ प्रारब्ध की सीमाएँ तय की हैं, वहीं मनुष्य को ‘कर्म’ की महती स्वाधीनता भी सौंपी है। प्रारब्ध यदि जीवन का मानचित्र है, तो कर्म उस पर तय की जाने वाली यात्रा। मनुष्य अपने पुरुषार्थ, विवेक और आचरण से उस जन्मजात भाग्य की रेखाओं को परिवर्तित करने की अद्वितीय क्षमता रखता है। यही कारण है कि सत्कर्मों से व्यक्ति अपने दुष्प्राप्य भाग्य को भी सौभाग्य में बदल लेता है, जबकि कुकर्मों के निष्फल भार से निर्मित हुआ भाग्य भी धूमिल हो जाता है।
इस संपूर्ण जीवन-चक्र और कर्म-यात्रा का सूक्ष्म अति सूक्ष्म लेखा-जोखा रखने का महादायित्व भगवान चित्रगुप्त के हाथों में निहित है। वे काल के अनंत पन्नों पर मनुष्य की प्रत्येक भावना, विचार और कार्य को निष्पक्षता से अंकित करते हैं। जब आत्मा अपनी भौतिक यात्रा पूर्ण कर, नश्वर शरीर का त्याग करती है और अपने अगले पड़ाव की ओर प्रस्थान करती है, तब भगवान चित्रगुप्त के समक्ष उसके कर्मों का न्यायोचित आकलन होता है।
चित्रगुप्त जी का यह आकलन केवल दंड या पुरस्कार का विधान नहीं, अपितु आत्मा के क्रमिक विकास का एक परम नियम है। कर्मों का यही संचित पुंज यह तय करता है कि आत्मा को अपने भावी भोग के लिए कैसा नया शरीर और वातावरण प्राप्त होगा।
अतः जीवन वास्तव में पूर्व जन्म के प्रारब्ध और वर्तमान के कर्म का एक सुंदर समन्वय है। विधाता की कलम यदि भाग्य लिखती है, तो मनुष्य का कर्म उस भाग्य में नवीन प्राण फूँककर उसका पुनर्लेखन करता है। यही कर्म-सिद्धांत की महानता है, जो मनुष्य को अपने ही भविष्य का वास्तविक शिल्पी बनाती है।



