
1971 के संसदीय चुनाव में इंदिरा गांधी से राजनारायण हार गए थे, उन्होंने इन्दिरा गांधी के खिलाफ इलाहाबाद उच्च न्यायालय में चुनाव धोखाधड़ी और चुनाव उद्देश्यों के लिए राज्य मशीनरी के उपयोग के मामले दर्ज किए ।
1971 के संसदीय चुनाव में इंदिरा गांधी से राजनारायण हार गए थे, उन्होंने इन्दिरा गांधी के खिलाफ इलाहाबाद उच्च न्यायालय में चुनाव धोखाधड़ी और चुनाव उद्देश्यों के लिए राज्य मशीनरी के उपयोग के मामले दर्ज किए ।
आपातकाल के 50 साल
डॉ. हीरा लाल कर्ण

1971 के संसदीय चुनाव में इंदिरा गांधी से राजनारायण हार गए थे, उन्होंने इन्दिरा गांधी के खिलाफ इलाहाबाद उच्च न्यायालय में चुनाव धोखाधड़ी और चुनाव उद्देश्यों के लिए राज्य मशीनरी के उपयोग के मामले दर्ज किए ।
12 जून 1975 को, इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति जगमोहनलाल सिन्हा ने प्रधानमंत्री को उनके चुनाव अभियान के लिए सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग के आरोप में दोषी पाया। न्यायालय ने उनके चुनाव को अमान्य घोषित कर उन्हें लोकसभा से बेदखल कर दिया । न्यायालय ने उन्हें अगले छह वर्षों के लिए किसी भी चुनाव में भाग लेने से भी प्रतिबंधित कर दिया। उन्हें सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग के लिए जिम्मेदार ठहराया गया था।इंदिरा गांधी ने उच्च न्यायालय के फैसले को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी। न्यायमूर्ति वी.आर. कृष्ण अय्यर ने 24 जून 1975 को उच्च न्यायालय के फैसले को बरकरार रखते हुए गांधी को सांसद के रूप में प्राप्त सभी विशेषाधिकारों को रोकने और उन्हें मतदान से प्रतिबंधित करने का आदेश दिया।हालांकि, उनकी अपील के निपटारे तक उन्हें प्रधानमंत्री पद पर बने रहने की अनुमति दी गई।
जयप्रकाश नारायण और मोरारजी देसाई ने प्रतिदिन सरकार विरोधी प्रदर्शनों का आह्वान किया। अगले दिन, जयप्रकाश नारायण ने दिल्ली में एक विशाल रैली का आयोजन किया, जहां उन्होंने कहा कि एक पुलिस अधिकारी को सरकार के आदेशों को अस्वीकार करना चाहिए यदि वे अनैतिक और अनुचित हों, क्योंकि यह महात्मा गांधी का स्वतंत्रता संग्राम के दौरान आदर्श वाक्य था। इस बयान को देश में विद्रोह भड़काने का संकेत माना गया। उसी दिन बाद में, इंदिरा गांधी ने राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद से आपातकाल घोषित करने का अनुरोध किया, जो इस प्रस्ताव के लिए तैयार थे और राष्ट्रपति ने इसे स्वीकृत किया। तीन घंटे के भीतर, सभी प्रमुख समाचार पत्रों की बिजली काट दी गई और राजनीतिक विरोधियों को गिरफ्तार कर लिया गया। यह प्रस्ताव केंद्रीय मंत्रिमंडल से बिना चर्चा किए भेजा गया था, जिसे इसकी जानकारी अगले दिन सुबह मिली और उन्होंने इसे मंजूरी दी।
सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से आहत होकर 25 जून 1975 की आधी रात को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा कर दी। 21 महीनों तक चले इस दौर में मौलिक अधिकारों को निलंबित कर दिया गया, प्रेस सेंसरशिप लगाई गई और लाखों राजनेताओं व कार्यकर्ताओं को जेल में डाल दिया गया, जिसे *संविधान हत्या दिवस* के रूप में याद किया जाता है।
जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में ‘संपूर्ण क्रांति’ और बिहार/गुजरात आंदोलनों ने सरकार के खिलाफ जन-आक्रोश बढ़ा दिया था।आंतरिक अशांति: संविधान के अनुच्छेद 352 का प्रयोग करते हुए राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने ‘आंतरिक अशांति’ के आधार पर आपातकाल की घोषणा की थी।
आपातकाल से पहले, इंदिरा गांधी सरकार ने कठोर कानून( निवारक हिरासत कानून ) पारित किए जिनका इस्तेमाल आपातकाल से पहले और उसके दौरान राजनीतिक विरोधियों को गिरफ्तार करने के लिए किया जाता था।
आपातकाल के 5 दिन बाद भारत रक्षा नियमों को विस्तारित किया गया और उनका नाम बदलकर भारत की रक्षा और आंतरिक सुरक्षा नियम कर दिया गया। एक अन्य कानून, विदेशी मुद्रा संरक्षण और तस्करी रोकथाम अधिनियम, जो दिसंबर 1974 में पारित किया गया था, का भी अक्सर राजनीतिक विरोधियों को निशाना बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाता था। विरोधी राजनेताओं को मीसा और डीआईआर जैसे सख्त कानूनों के तहत बिना मुकदमा चलाए जेल में डाल दिया गया। मीडिया की स्वतंत्रता पूरी तरह से छीन ली गई। अखबारों को छापने से पहले सरकार से अनुमति लेनी पड़ती थी। 42वां संविधान संशोधन लागू किया गया, जिसने कार्यपालिका और संसद की शक्तियों को असीमित रूप से बढ़ा दिया और न्यायपालिका के अधिकारों में कटौती की। संजय गांधी के नेतृत्व में परिवार नियोजन के नाम पर बड़े पैमाने पर जबरन नसबंदी अभियान चलाया गया। सरकारी कर्मचारियों को नसबंदी का मंथली टारगेट पूरा नहीं करने पर सैलरी रोकने की धमकी दी जाने लगी थी।
मार्च 1977 में आपातकाल समाप्त हुआ और चुनाव हुए। जनता ने सत्ताधारी कांग्रेस को करारी शिकस्त दी और देश में पहली बार गैर-कांग्रेसी” जनता पार्टी” की सरकार बनी।संविधान संशोधन: 1978 में 44 वां संविधान संशोधन लाया गया, जिसके तहत आपातकाल के दुरुपयोग को रोकने के लिए ‘आंतरिक अशांति’ शब्द को बदलकर ‘सल्शस्त्र विद्रोह’ किया गया।वर्तमान संदर्भ: पांच दशक पूरे होने पर, संविधान हत्या दिवस के माध्यम से लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा और संविधान की सर्वोच्चता का संदेश दिया जा रहा है।
*डॉ. हीरा लाल कर्ण*
*स्वतंत्र लेखक एवं समाज सेवी*



