
देश
गर्म हवा के झोंके चलते आग उगलती दोपहरी ये अंगारे सा दिन, कब आषाढ़ घन गरजेंगे कब बरसेगा सावन।
गर्म हवा के झोंके चलते आग उगलती दोपहरी ये अंगारे सा दिन, कब आषाढ़ घन गरजेंगे कब बरसेगा सावन।
गर्म हवा के झोंके चलते
आग उगलती दोपहरी ये अंगारे सा दिन,
कब आषाढ़ घन गरजेंगे कब बरसेगा सावन।

सड़कों पर सन्नाटा लेटा,
मृग मरीचिका बनकर,
गर्म हवा के झोंके चलते,
रात-रात भर तन कर।
प्रातः से ही तपन तपस्विन करने लगी हवन,
भीषण गर्मी लगती है सूरज की सगी बहन।
रखा निर्जला व्रत इस ऋतु ने
पांव छांव के व्याकुल,
श्वेत अंगोछा बांधे सिर पर
हांफ रहा मलयानिल।
पंखा झलती पल्लू के कोने से सांझ दुल्हन,
उमस खोल कर बैठी वक्षस्थल के सब बंधन।
प्यासे अधर नदी झरनों के,
गले कुओं के सूखे,
दिन भर के दुबके नीड़ों
में पंछी सोऐं भूखे।
कब रिमझिम के गीत गुनगुनाऐंगे धरा गगन।
कब मेघों का बीजुरियों से होगा मधुर मिलन।
आग उगलती दोपहरी यह अंगारे सा दिन,
कब आषाढ़ घन गरजेंगे कब,बरसेगा सावन।
गीतकार- अनिल भारद्वाज एडवोकेट हाईकोर्ट ग्वालियर।



